थी वतन में शान क्या 'ग़ालिब' कि हो ग़ुर्बत में क़द्र
बे-तकल्लुफ़ हूँ वो मुश्त-ए-ख़स कि गुलख़न में नहीं
“What glory did Ghalib possess in his homeland, that in exile he might find acclaim? I am, without reserve, that handful of dry straw, not even found for the furnace's flame.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
वतन में 'ग़ालिब' मेरी क्या शान थी कि परदेस में मुझे इज़्ज़त मिले? मैं तो बेझिझक वो मुट्ठी भर तिनका हूँ जो भट्टी में जलाने के भी काम का नहीं।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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