ग़ज़ल
સાંજની વેળા
شام کا وقت
यह ग़ज़ल सांध्यकाल के शांत और मनमोहक सौंदर्य का वर्णन करती है। कवि ने इस समय को प्रेम और चिंतन के भाव से जोड़ा है, जहाँ प्रकृति और मन दोनों एक विशेष लय में आ जाते हैं। यह समय न केवल विश्राम का, बल्कि आत्म-मंथन और गहन भावनाओं के अनुभव का भी प्रतीक है।
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1
રે મન! આવી સાંજની વેળા
ગોધણ લૈ ગોવાળ અમારા થયા નહીં ઘરભેળા,
रे मन! आई सांझ की बेला, गोधन लिए ग्वाल हमारे लौटे नहीं घर।
ओ मन! शाम का समय आ गया है, हमारे ग्वाले अपने मवेशियों के साथ अभी तक घर नहीं लौटे हैं।
2
દી આખો આ એકલવાયું ચિત્ત ચઢે ચકડોળે,
મન-મંજરીઓ મ્હોરી રે’તી,
दिन भर यह अकेला चित्त चक्रडोल पर झूले,मन-मंजरियां खिलती रहती,
पूरे दिन यह अकेला चित्त चक्रडोल पर झूलता रहता है, और मन की कलियाँ लगातार खिलती रहती हैं। यह भावनात्मक अकेलेपन के बीच निरंतर आंतरिक गतिविधि और नए विचारों के पनपने की स्थिति को दर्शाता है।
3
રસ રજનીના ખોળે;
સાંજ-સવારે રોજ ભરાતા ને વિખરાતા મેળા,
रस रजनी के आँचल में;साँझ-सवेरे रोज़ भरते और बिखरते मेले,
रात का रस उसकी गोद में समाया है, ठीक वैसे ही जैसे मेले हर शाम-सुबह लगते और बिखर जाते हैं। यह इस क्षणिक प्रकृति को दर्शाता है कि गहरे अनुभव भी रोज़ आते और चले जाते हैं।
4
સૂર્યમુખીના ફૂલ શું હૈયું કરમાતું જે વ્હાણે,
સોળ કળાએ કળીઓ એની ખીલતી ગોરજ ટાણે;
सूर्यमुखी के फूल सा हृदय मुरझाता जो भोर में,सोलह कलाओं से उसकी कलियाँ खिलती गोधूलि के क्षण में;
सूर्यमुखी के फूल की तरह, मेरा हृदय सुबह मुरझा जाता है। लेकिन, उसकी कलियाँ गोधूलि वेला में सोलह कलाओं से खिल उठती हैं।
5
ઉગમણે એનાં વળામણાં આથમણે એનાં તેડાં,
રે મન! આવી સાંજની વેળા.
पूरब में उसकी विदाई, पश्चिम में उसके बुलावें,हे मन! आ गई है शाम की बेला।
पूर्व से उसके विदाई के क्षण होते हैं और पश्चिम से उसे बुलावा आता है। हे मन! अब संध्या का समय आ गया है।
6
આતુર નયને દૂર દિશામાં ડમરી ઊડતી ભાળું,
આછેરા અંધારની ઓથે આવે મુજ અજવાળું,
आतुर नयनों से दूर दिशा में डमरी उड़ती देखूँ,हल्के अँधेरे की ओट से आता मेरा उजाला।
मैं आतुर नयनों से दूर दिशा में धूल उड़ती देखता हूँ, और हल्के अँधेरे के पीछे से मेरा उजाला आता है।
7
ભરતી ટાણે ઉભરાયા શું સ્નેહ-સરિતના વ્હેળા!
રે મન! આવી સાંજની વેળા.
क्या भरती के क्षण में उमड़ आईं प्रेम-सरिता की धाराएँ?रे मन! ऐसी साँझ की वेला आ गई।
यह शेर पूछता है कि क्या प्रेम रूपी नदी की धाराएँ ज्वार के समय उमड़ पड़ीं, और इस भावनात्मक उफान को शाम के समय के आगमन से जोड़ता है।
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