ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो मिरे फ़साना-ए-ग़म को मिरी ज़बाँ से सुनो

“This is no tale for a storyteller to unfold; hear the story of my sorrow from my own lips told.”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

यह कोई ऐसा किस्सा नहीं है जिसे तुम किसी कहानी सुनाने वाले से सुनो; मेरे दर्द की दास्तान को खुद मेरी ही ज़ुबानी सुनो।

विस्तार

शायर यहाँ दास्तानगोई और दिली दर्द के बीच का फ़र्क़ समझाते हुए कहते हैं कि उनकी तकलीफ़ कोई तमाशे जैसी कहानी नहीं है जिसे कोई क़िस्सागो महफ़िल में मज़ा लेकर सुनाए। किसी दूसरे के बयान में यह सिर्फ़ एक अफ़साना लगेगी, मगर इसमें छिपी असली तड़प वही समझा सकता है जिसने इसे झेला हो। इसलिए वे महबूब से गुज़ारिश करते हैं कि वह इस ग़म को सीधे उन्हीं के लफ़्ज़ों और एहसासात से महसूस करे।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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