ग़ज़ल
हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में
ہجر کے ہاتھ سے اب خاک پڑے جینے میں
यह ग़ज़ल विरह (हिज्र) के असहनीय दर्द और जीवन की निरर्थकता को मार्मिक रूप से व्यक्त करती है। शायर सीने के निरंतर उठते दर्द और ख़ून-ए-दिल पीने की पीड़ा में ही एक अनूठा सुकून पाता है, जो सांसारिक आनंद से कहीं गहरा है।
Source: rekhta · HI
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1
हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में
दर्द इक और उठा आह नया सीने में
2
ख़ून-ए-दिल पीने से जो कुछ है हलावत हम को
ये मज़ा और किसी को नहीं मय पीने में
3
दिल को किस शक्ल से अपने न मुसफ़्फ़ा रक्खूँ
जल्वा-गर यार की सूरत है इस आईने में
4
अश्क ओ लख़्त-ए-जिगर आँखों में नहीं हैं मेरे
हैं भरे लाल ओ गुहर इश्क़ के गंजीने में
5
शक्ल-ए-आईना 'ज़फ़र' से तो न रख दिल में ख़याल
कुछ मज़ा भी है भला जान मिरी लेने में
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