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ग़ज़ल

નીકળ્યા!

નીકળ્યા!
अमृत घायल· Ghazal· 7 shers

यह ग़ज़ल किसी खास घटना या व्यक्ति को संबोधित करते हुए लिखी गई है, जिसमें विदाई और आगे बढ़ने का भाव है। कवि श्रोता से कह रहा है कि अब उन्हें जाना चाहिए और अपनी राह पर निकल जाना चाहिए।

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1
ના હિન્દુ નીકળ્યા, ન મુસલમાન નીકળ્યા, કબરો ઉઘાડી જોયું તો ઇન્સાન નીકળ્યા.
न हिंदू निकले, न मुसलमान निकले,कब्रें खोलीं तो बस इंसान निकले।
जब कब्रें खोली गईं तो न कोई हिन्दू निकला, न कोई मुसलमान निकला, बल्कि केवल इंसान ही निकले। यह दर्शाता है कि मृत्यु के बाद सभी भेद मिट जाते हैं और केवल मानवता ही शेष रहती है।
4
એ રંગ જેને જીવ સમા જાળવ્યા હતાં. એ રંગ એક રાતના મહેમાન નીકળ્યા.
वो रंग जिन्हें जान की तरह संजोया था।वो रंग एक रात के मेहमान निकले।
उन रंगों को जिन्हें मैंने अपने प्राणों के समान सँजोकर रखा था, वे रंग केवल एक रात के मेहमान निकले।
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