ग़ज़ल
કંઈ તો છે કે જેથી ઊંચોનીચો થાય છે દરિયો
کچھ تو ہے کہ جس سے دریا کا اونچا نیچا ہوتا ہے
यह ग़ज़ल प्रकृति की अद्भुत और रहस्यमयी शक्तियों का वर्णन करती है, विशेष रूप से समुद्र के ज्वार-भाटे के माध्यम से। कवि इस प्राकृतिक लय में एक गहरे अस्तित्वगत अर्थ को खोजता है, जो जीवन के उतार-चढ़ाव और निरंतर परिवर्तन को दर्शाता है। यह मानव जीवन के उतार-चढ़ावों की उपमा है, जहाँ हर उतार के बाद एक नई ऊँचाई आती है।
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1
કંઈ તો છે કે જેથી ઊંચોનીચો થાય છે દરિયો;
મને તો આપણી જેમ જ દુઃખી દેખાય છે દરિયો.
कुछ तो है जिससे ऊँचा-नीचा होता है दरिया;मुझे तो अपनी तरह ही दुखी दिखता है दरिया।
कवि कहता है कि कोई तो वजह है जिससे समुद्र ऊपर-नीचे होता है; उसे तो समुद्र भी अपनी ही तरह दुखी दिखाई देता है।
2
દિવસ આખો દિવસના તાપમાં શેકાય છે દરિયો;
અને રાતે અજંપો જોઈને અકળાય છે દરિયો.
दिवस आख़ा दिवस के ताप में सिकता है दरिया;और रात में बेचैनी देख के अकुलाता है दरिया।
पूरे दिन समुद्र दिन की तीव्र गर्मी में तपता है। और रात में बेचैनी देखकर वह व्याकुल हो जाता है।
3
કહે છે કોણ કે ક્યારેય ન છલકાય છે દરિયો?
લથડિયાં ચાંદનીમાં રાત આખી ખાય છે દરિયો!
कहता है कौन कि कभी छलकता नहीं दरिया?लथड़िया चाँदनी में रात भर खाता है दरिया!
कौन कहता है कि दरिया कभी नहीं छलकता? दरिया चाँदनी में पूरी रात लड़खड़ाता रहता है।
4
ખબર સુધ્ધાં નથી એને, ભીતર શી આગ સળગે છે!
નીતરતી ચાંદનીમાં બેફિકર થઈ, ન્હાય છે દરિયો.
उसे खबर तक नहीं है, भीतर कैसी आग जलती है! रिसती चाँदनी में बेफिक्र हो, नहाता है दरिया।
इस छंद में बताया गया है कि किसी को अपने भीतर जल रही तीव्र अग्नि या संघर्ष का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं है। बाहर से वह शांत और बेफिक्र दिखाई देता है, जैसे दरिया चाँदनी में सुकून से नहा रहा हो।
5
પ્રભુ જાણે, ગયો છે ચાંદનીમાં એવું શું ભાળી!
કે એના દ્વારની સામે ઊભો સુકાય છે દરિયો!
प्रभु जाने, गया है चाँदनी में क्या ऐसा देखा!कि उसके द्वार पर, सागर खड़ा सूख रहा है!
प्रभु जाने, चाँदनी में उसने ऐसा क्या देखा है कि उसके द्वार पर सागर खड़ा सूख रहा है।
6
જીવન, સાચું પૂછો તો એમનું કીકીના જેવું છે,
કદી ફેલાય છે ક્યારેક સંકોચાય છે દરિયો!
जीवन, सच पूछो तो उनका पुतली जैसा है,कभी फैलता है कभी सिकुड़ता है दरिया!
जीवन उनकी आँख की पुतली जैसा है, जो कभी फैलती है तो कभी सिकुड़ती है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र कभी फैलता है और कभी सिकुड़ता है। यह जीवन के बदलते स्वभाव को दर्शाता है।
7
ઠરીને ઠામ થાવા એ જ છે જાણે કે ઠેકાણું,
કે જેનીતેની આંખોમાં જઈ, ડોકાય છે દરિયો!
ठहरकर ठिकाना पाने को, वही है मानो ठिकाना,कि जिसकी-तिसकी आँखों में जा, झाँकता है दरिया!
ठहरकर ठिकाना पाने के लिए, वही मानो ठिकाना है, जहाँ दरिया हर किसी की आँखों में जाकर झाँकता है।
8
બડો ચબરાક છે, સંગ એમનો કરવો નથી સારો,
નદી જેવી નદીને પણ ભગાડી જાય છે દરિયો!
बड़ा चालाक है वो, उसकी सोहबत ठीक नहीं, नदी जैसी नदी को भी भगा ले जाता है दरिया!
वह बड़ा चालाक है, उसकी सोहबत ठीक नहीं। दरिया नदी जैसी नदी को भी बहा ले जाता है।
9
ગમે ત્યારે જુઓ ‘ઘાયલ’ ઘૂઘવતો હોય છે આમ જ,
દિવસના શું? ઘડી રાતેય ના ઘોંટાય છે દરિયો!
जब भी देखो ‘घायल’ यूँ ही गर्जना करता है,दिन की क्या? रात में भी पल भर सागर समाता नहीं!
कवि 'घायल' हर पल बेचैन और उथल-पुथल में रहता है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र दिन की तो क्या रात में भी एक पल के लिए भी शांत नहीं होता।
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