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ग़ज़ल

કંઈ તો છે કે જેથી ઊંચોનીચો થાય છે દરિયો

کچھ تو ہے کہ جس سے دریا کا اونچا نیچا ہوتا ہے
अमृत घायल· Ghazal· 9 shers

यह ग़ज़ल प्रकृति की अद्भुत और रहस्यमयी शक्तियों का वर्णन करती है, विशेष रूप से समुद्र के ज्वार-भाटे के माध्यम से। कवि इस प्राकृतिक लय में एक गहरे अस्तित्वगत अर्थ को खोजता है, जो जीवन के उतार-चढ़ाव और निरंतर परिवर्तन को दर्शाता है। यह मानव जीवन के उतार-चढ़ावों की उपमा है, जहाँ हर उतार के बाद एक नई ऊँचाई आती है।

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ખબર સુધ્ધાં નથી એને, ભીતર શી આગ સળગે છે! નીતરતી ચાંદનીમાં બેફિકર થઈ, ન્હાય છે દરિયો.
उसे खबर तक नहीं है, भीतर कैसी आग जलती है! रिसती चाँदनी में बेफिक्र हो, नहाता है दरिया।
इस छंद में बताया गया है कि किसी को अपने भीतर जल रही तीव्र अग्नि या संघर्ष का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं है। बाहर से वह शांत और बेफिक्र दिखाई देता है, जैसे दरिया चाँदनी में सुकून से नहा रहा हो।
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જીવન, સાચું પૂછો તો એમનું કીકીના જેવું છે, કદી ફેલાય છે ક્યારેક સંકોચાય છે દરિયો!
जीवन, सच पूछो तो उनका पुतली जैसा है,कभी फैलता है कभी सिकुड़ता है दरिया!
जीवन उनकी आँख की पुतली जैसा है, जो कभी फैलती है तो कभी सिकुड़ती है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र कभी फैलता है और कभी सिकुड़ता है। यह जीवन के बदलते स्वभाव को दर्शाता है।
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ગમે ત્યારે જુઓ ‘ઘાયલ’ ઘૂઘવતો હોય છે આમ જ, દિવસના શું? ઘડી રાતેય ના ઘોંટાય છે દરિયો!
जब भी देखो ‘घायल’ यूँ ही गर्जना करता है,दिन की क्या? रात में भी पल भर सागर समाता नहीं!
कवि 'घायल' हर पल बेचैन और उथल-पुथल में रहता है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र दिन की तो क्या रात में भी एक पल के लिए भी शांत नहीं होता।
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