ग़ज़ल

आगे बढ़े न क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम

آگے بڑھے نہ قصۂ عشق بتاں سے ہم
अल्ताफ़ हुसैन हाली· Ghazal· 5 shers· radif: से हम

यह ग़ज़ल सांसारिक प्रेम के चक्कर में उलझे रहने और राज़दारों के सामने भी अपने दिल के राज़ न खोल पाने की विवशता को दर्शाती है। दिल के डर और तक़दीर की बेरुखी से आहत होकर शायर अब इश्क़ के साए से भी दूर भागने का दर्द बयां करता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
अभी गीत नहीं
लिपि व अर्थ
1
आगे बढ़े न क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम सब कुछ कहा मगर न खुले राज़दाँ से हम
हम सांसारिक सुंदरियों के प्रेम के किस्से से आगे कभी नहीं बढ़ सके; हमने सब कुछ कह दिया, लेकिन अपने राज़दार के सामने भी दिल का असली भेद कभी नहीं खोला।
2
अब भागते हैं साया-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम कुछ दिल से हैं डरे हुए कुछ आसमाँ से हम
अब हम सुंदरियों के प्रेम की परछाईं से भी भागते हैं, क्योंकि कुछ तो हम अपने दिल से डरे हुए हैं और कुछ आसमान यानी क़िस्मत से।
3
हँसते हैं उस के गिर्या-ए-बे-इख़्तियार पर भूले हैं बात कह के कोई राज़दाँ से हम
हम उसके बेकाबू होकर रोने पर हँस रहे हैं, यह भूलकर कि हमने भी अपने किसी राज़दार से कोई भेद कह दिया है।
4
अब शौक़ से बिगड़ के ही बातें किया करो कुछ पा गए हैं आप के तर्ज़-ए-बयाँ से हम
अब आप शौक से नाराज़ होकर ही बात किया कीजिए, क्योंकि हम आपके बात करने के अंदाज़ से बहुत कुछ समझ चुके हैं।
5
जन्नत में तो नहीं अगर ये ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-इश्क़ बदलेंगे तुझ को ज़िंदगी-ए-जावेदाँ से हम
ऐ इश्क़ की तलवार के ज़ख़्म, अगर तू जन्नत में मौजूद नहीं है, तो हम हमेशा की ज़िंदगी के बदले भी तुझे ही चुनेंगे।
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

आगे बढ़े न क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम | Sukhan AI