“Beyond the tale of loving idols, we could never advance; though we spoke of all, we never bared our secret to any confidant.”
हम सांसारिक सुंदरियों के प्रेम के किस्से से आगे कभी नहीं बढ़ सके; हमने सब कुछ कह दिया, लेकिन अपने राज़दार के सामने भी दिल का असली भेद कभी नहीं खोला।
इस शेर में शायर ज़िंदगी की एक बड़ी सच्चाई को बहुत सादगी से बयान कर रहे हैं। 'इश्क़-ए-बुताँ' यानी दुनियावी महबूबों की ख़ूबसूरती के फ़साने में ही दिल अटका रहा और हम कभी इससे आगे रूहानी या गहरी समझ तक नहीं पहुँच सके। विडंबना यह है कि हमने महफ़िल में बातें तो बहुत कीं, मगर दिल का जो सबसे गहरा दर्द या असल राज़ था, वह अपने सबसे क़रीबी राज़दार के सामने भी कभी न खुल सका।
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