अवाम बाँध लें दोहर तो थर्ड वानटर में सेकंड-फ़र्स्ट की हों बंद खिड़कियाँ कब तक

“When the common masses bundle up tight in third class against the chill, how long can the first and second class keep their windows shuttered still?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

यदि आम जनता जाड़ों में ट्रेन के तीसरे दर्जे में दोहर ओढ़ ले, तो पहले और दूसरे दर्जे की खिड़कियाँ कब तक बंद रह सकती हैं?

विस्तार

यहाँ शायर ने रेलगाड़ी के अलग-अलग दर्जों के ज़रिये समाज के अमीर और ग़रीब के फ़र्क़ पर बड़ी साफ़गोई से चोट की है। आम लोग जब कड़कड़ाती ठंड में थर्ड क्लास के डिब्बे में चादरें लपेटकर हालात से जूझने लगते हैं, तो यह सिर्फ़ उनकी तकलीफ़ नहीं बल्कि एक ख़ामोश इंक़लाब की आहट है। शेर पूछता है कि आख़िर ऐश-ओ-आराम में डूबा ऊँचा तबक़ा कब तक अपनी खिड़कियाँ बंद करके इस कड़वी हक़ीक़त से नज़रें चुराता रहेगा?

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