“Venerable Sir Akbar champions the veil, it is true; / But how long will he endure, and how long his verses too?”
आदरणीय अकबर इलाहाबादी पर्दे के समर्थक तो हैं, मगर आख़िर वो कब तक रहेंगे और उनकी रुबाइयाँ कब तक टिक पाएँगी?
अकबर इलाहाबादी अपने तीखे व्यंग्य और पारंपरिक मूल्यों, ख़ासकर 'परदे' की पुरज़ोर हिमायत के लिए जाने जाते थे। इस शेर में बहुत नफ़ासत से ज़माने की बदलती रफ़्तार पर बात की गई है, जहाँ आधुनिकता की हवा तेज़ी से चल रही है। शायर एक मुस्कुराती हुई बेबसी के साथ सवाल करता है कि चाहे अकबर कितने भी बड़े शायर क्यों न हों, महज़ उनकी रुबाइयाँ वक़्त के इस नए और अटल बदलाव को आख़िर कब तक रोक पाएँगी।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
