“If Satan insists so stubbornly upon the custom of unveiling, / How long shall the daughters of Eve remain concealed?”
अगर शैतान मुँह दिखाई की रस्म पर इस कदर अड़ा हुआ है, तो हज़रत-ए-हव्वा की बेटियाँ आख़िर कब तक छुपी रह पाएँगी।
यहाँ शायर ने 'मुँह-दिखाई' की पारंपरिक रस्म को एक गहरे सामाजिक और रूहानी आईने में पेश किया है। शैतान को इस ज़िद पर अड़ा हुआ दिखाया गया है कि वह हर हाल में पर्दा और हया छीन लेना चाहता है, जबकि 'हज़रत-ए-हव्वा की बेटियाँ' औरत के वकार, पाकीज़गी और गरिमा का प्रतीक हैं। यह शेर एक दर्द भरी चिंता ज़ाहिर करता है कि इस लालची और बेबाक दुनिया के फ़रेब से मासूमियत और तहज़ीब आख़िर कब तक महफ़ूज़ रह सकेगी।
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