Ghazal Explained · 8:38
Hangama Hai Kyun Barpa – Ghazal Explained
हंगामा है क्यूँ बरपा
About this video
Akbar Allahabadi's 'Hangama Hai Kyun Barpa' is one of the most celebrated ghazals in Urdu poetry, often mistaken as a song of intoxication. However, the poet himself never drank a drop of wine. This video delves into the historical context of colonial India, where Akbar Allahabadi, a judge by profession, used satire and symbolism to respond to his critics. The ghazal employs 'wine' as a metaphor for free thought, spiritual ecstasy, and humanism, rather than literal intoxication. Each couplet is unpacked to reveal layers of meaning—criticizing superficial piety, advocating for inner purity, and questioning hollow displays of culture and education. The video also explores the ghazal's journey through popular culture, including its renditions by Mehdi Hassan and Ghulam Ali. Through this analysis, viewers gain a deeper appreciation of Akbar Allahabadi's wit, his subtle critique of society, and the enduring relevance of his poetry.
- ◆Akbar Allahabadi used wine as a metaphor for free thought and spiritual ecstasy.
- ◆The ghazal critiques superficial religiosity and hollow displays of culture.
- ◆Emphasizes the importance of inner purity and intention over outward show.
- ◆Highlights Hindu-Muslim unity and liberal values during colonial India.
- ◆The poem remains relevant and popular in contemporary culture.
Couplets in this video
ना-तजुर्बा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातेंइस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है
nā-tajurba-kārī se wā'iz kī ye haiṅ bāteṅis raṅg ko kyā jāne pūchho to kabhī pī hai
The preacher's sermons stem from his naivety; what could he know of this ecstasy without ever tasting it?
उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगानामक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है
us mai se nahīṅ matlab dil jis se hai begānāmaqsūd hai us mai se dil hī meṅ jo khiṅchtī hai
I care not for the wine that estranges the heart; my quest is for the wine distilled within.
तालीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतनाबरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है
ta.alīm kā shor aisā tahzīb kā ghul itnābarkat jo nahīn hotī niyyat kī kharābī hai
There is a loud clamor for learning and culture; if blessings don't flourish, the intent is foul.
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उर्दू की सबसे मशूर शराब वाली गजलों में से एक, जिसे सुनकर लगता है कि शायर नशे में धुत है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे लिखने वाले ने जिन्दगी भर शराब की एक बून तक नहीं पी थी?
ये गजल मिर्जा गालिब की नहीं बलकि उनीसवी सदी के मशूर शायर और अंग्रेजी हुकूमत में जज रहे अकबर इलाहबादी की है, जब अंग्रेज फूट डालों और राजकरों की नीती अपना रहे थे, अकबर हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते थे, आलोचकों
थोड़ी सी जो पी ली है, ढाका तो नहीं मारा, चोरी तो नहीं की है।
इस मक्ते को समझने के लिए कुछ अलफास देखते हैं, हंगामा यानी शोर या बवाल,
बरपा यानी खड़ा किया हुआ या मचा हुआ, और ढाका का मतलब है लूट या डकैती।
शायर पूछता है कि अगर मैंने थोड़ी सी शराब पी ही ली है, तो इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है,
मैंने कोई ढाका तो नहीं डाला, और नहीं कोई चोरी की है।
यहां शराब कोई नशीला पे नहीं है, ये आजाद खयाली और इंसानियत का प्रतीक है।
अक्बर अपने आलोचुकों से कह रहे हैं कि मेरे खुले विचारों पर इतना बावाल क्यूं, मैंने कोई जुर्म नहीं किया है, बस एक अलग सोच रखी है।
ना तजर्बाकारी से वाइज किये हैं बातें, इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है।
यहां ना तजर्बाकारी का मतलब है अनुभव की कमी, और वाइज कहते हैं उपदेशक या नसीह देने वाले को। उपदेशक की ये बातें सिर्फ उसकी अनुभव हींता की वाजसे हैं, वो इस मस्ती के रंग को क्या समझे, सरा उससे पूछो तो सही कि क्या उसने कभी
मज़ा ही नहीं चखा, वो भला इसके रंग को क्या समझेगा। उस मैंसे नहीं मतलब, दिल जिससे है बेगाना। मक्सूद है उस मैंसे, दिल ही में जो खिचती है। अलफास पर गौर करें, मैं यानी शराब, बेगाना का मतलब है अञ्जान या अजनबी, और मक्सूद �
पर दिल के अंदर ही तैयार होती है। यहां अकबर साफ कर देते हैं, कि वो दुनियावी शराब की बात नहीं कर रहें, जो होश छीन लेती है। उनकी मन्जिल तो वो रूहानी शराब है, जो इनसान के दिल में मोहबत, करुणा, और इंसानियत के जज़बे से तैयार
है। इस शेर की जान एक सूफी लव्ज में है, बर्के तजली, जिसका मतलब है ईश्वर्य प्रकाश की कौंधती हुई बिजली, शौक यानी चाहत या लगन। एचाहत, तु वही रूहानी शराब पी ले, और एहोश, तु जरह सो जा, क्योंकि इस समय मेरी नजरों की मह
अनुभव होता है, तब दुनियावी तरक, अकल, और होश, बेमानी हो जाते हैं। वहां सिर्फ शौक, यानी रूहानी लगन ही काम आती है।
वहां दिल में की सद्मे दो, यहां जी में की सब सहलो। उनका भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है।
यहां सद्मे का मतलब है गहरी चोट या दुक, वहां यानी वहां, और यां यानी यहां।
वहां उनके दील में ये बात है की दरद और सद्मे पहुचयाएँ, जब की यहां मेरे दिल में ये है की सबकुछ चुप-चाब सहले, उनका दिल भी कित्ना अनोखा है, और मेरा दिल भी कित्ना अजीब है।
ये शेर जुल्म करने वाले और उसे सेहने वाले के बीच का फर्क दिखाता है, आलोचकों का काम है तन्स कसना और चोट पहुचाना, लेकिन शायर का दिल इतना बढ़ा है की वो सबकुछ बिना शिकायत सहे जा रहा है।
हर जर्ड चमकता है अनवारेलाही से हर सांस ये कहती है हम है तो खुदा भी है। इस शेर में जर्ड का अर्थर कण या परमाणू और अनवारेलाही का मतलब है ईशवर का नूर या दिव्यकास . श्रिष्टि का हर कन, ईशवर के नूर से चमक रहा है photographed क
या नी कण कण में ईशवर का सूफी फलसफाज है लगता है। अकबर कहते हैं की ईशवर को ढूणने के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। मेरा और आपका वजूद ही उसके होने का सबसे बड़ा सुबूत है। सूरज में लगे धब्बा फितरत के करिशमे हैं। बु�
मेहभूब या कटर लोग और काफिर यानी जो ईशवर को ना मानें। सूरज पर धब्बा लगना तो कुदरत का करिशमा है। अगर बुद या कटर लोग हमें काफिर कहते हैं तो ये भी अल्ला की ही मरजी है। जिस तरह इतने रोशन सूरज में भी धब्बे होते हैं उस
शिक्षा के लिए तालीम का शोर ऐसा, तहजीब का घुल इतना, बरकत जो नहीं होती, नियत की खराबी है। इस शेर में तालीम का मतलब है शिक्षा, तहजीब यानी संस्कृती या शिष्टाचार, और बरकत का आर्थ है सम्रिद्धी या लाब। शिक्षा और तहजीब
अकबर इलाहा बादी आधूनिक और दिखावटी शिक्षा के कड़े आलोचक थे।
वो कहते हैं कि डिग्रियां और ऊपरी शिष्टाचार बहुत हैं, लेकिन अगर दिल में सच्चाई और नियत साफ नहीं हैं,
तो समाज में कभी बरकत या शान्ती नहीं आ सकती।
कि इश्वर की आग्या का पालन, तर्क मतलब छोड़ देना, और शाहिद यहां महभूब या सुन्दर्ता के लिए इस्तमाल हुआ है।
ए अकबर, शेख बिल्कुल सच कहते हैं कि इश्वर की आग्या का पालन करना जरूरी है,
लेकिन शराब और महभूब दोनों को छोड़ देना, यह केवल उनका ही बडबपन है।
यह मक्ता एक गहरा तंज है। शायर कहता है कि इबादात अबनी जगा ठीक है, लेकिन शेख का जो सारा बडबपन है,
वो सिर्फ इस बात पर ठीका है कि उन्होंने दुनिया की हर खुशी छोड़ दी है। क्या असली महंता सिर्फ चीजों को छोड़ने में है।
यह गजल आज आम बोलचाल का हिस्सा बन जुकी है। लोग अपनी छोटी मोटी गलतियों को छुपाने के लिए मजाक में कहते हैं थोड़ी सी जो पीली है।
इसे 1990 की पाकिस्तानी फिल्म आपका खादिम में महदी असन की आवाज में इस्तमाल किया गया था। जहां इसके बोल किसी और के नाम से छाप दिये गए थे।
लेकिन इसे असली पहचान और अमर्ता दिलाई उस्ताद गुलामली साहब ने। जिनकी राग दरबारी कहनड़ा में गाई गई ये गजल आज भी महफिलों की जान है।
अक्बर एलाहबादी ने तंस के तीरों से जो रुहाणी शराब इस गजल में उंडे ली उसका नशा आज भी कम नहीं हुआ है। पूरी गजल, हर शेर का मतलब और गाया हुआ रूप सुखन.AI पर।
