ग़ज़ल

हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों

اے ہری، تو نے بڑا کرم کیا
तुलसीदास· Pad· 5 shers

इस रचना में भक्त ईश्वर की असीम कृपा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है, जिसने देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानव देह प्रदान की है। प्रभु के अनगिनत उपकारों को स्वीकार करते हुए, वह अत्यंत विनम्रता से परम उदार परमात्मा से अनन्य भक्ति की याचना करता है।

Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI

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लिपि व अर्थ
1
हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों । साधन-धाम बिबुध-दुर्लभ तनु मोहि कृपा करि दीन्हों ॥
हे प्रभु, आपने मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की है। आपने दया करके मुझे यह मानव शरीर दिया है, जो साधना का घर है और देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है।
2
कोटिहुँ मुख कहि जायँ न प्रभु के एक एक उपकार । तदपि नाथ कछु और माँगिहौं दीजै परम उदार ॥
करोड़ों मुखों से भी प्रभु के एक-एक उपकार का वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर भी हे परम उदार नाथ! मैं आपसे कुछ और माँगता हूँ, कृपा कर मुझे प्रदान कीजिए।
3
बिषय-बारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक । तातेँ सहिय बिपति अति दारुन जनमत जोनि अनेक ॥
मन रूपी मछली विषय-वासनाओं के जल से एक पल के लिए भी अलग नहीं होती। इसी कारण उसे अनेक योनियों में जन्म लेते हुए अत्यंत दारुण कष्ट सहने पड़ते हैं।
4
कृपा-डोरि, बंसी-पद-अंकुस, परम प्रेम-मृदु-चारो । हिय बिधि बेधि हरहु मेरो दुख, कौतुक राम तिहारो ॥
हे राम! अपनी कृपा की डोरी, चरण रूपी कांटे और परम प्रेम के कोमल चारे से मेरे हृदय को बींधकर मेरे दुख को हर लीजिए, क्योंकि यह तो आपके लिए बस एक कौतुक (खेल) है।
5
हैं स्रुति-बिदित उपाय सकल, सुर केहि केहि दीन निहोरै ? तुलसिदास यहि जीव मोह-रजु जोइ बाँध्यो सोइ छोरै ॥
वेदों में मुक्ति के सभी उपाय बताए गए हैं, परंतु यह दीन जीव किस-किस देवता से विनती करे? तुलसीदास कहते हैं कि इस जीव को मोह की जिस रस्सी से बांधा गया है, उसे केवल वही (ईश्वर) खोल सकता है जिसने इसे बांधा है।
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