“Never for a moment does the fish of the mind part from desire's stream, / Hence it suffers direst sorrows, reborn endlessly through life's cruel dream.”
मन रूपी मछली विषय-वासनाओं के जल से एक पल के लिए भी अलग नहीं होती। इसी कारण उसे अनेक योनियों में जन्म लेते हुए अत्यंत दारुण कष्ट सहने पड़ते हैं।
इस दोहे में कवि ने हमारे मन की तुलना एक मछली से और सांसारिक सुखों की तुलना जल से की है। जिस तरह एक मछली पानी से एक पल भी अलग नहीं रह सकती, उसी तरह हमारा चंचल मन भी भोग-विलासों और इच्छाओं से अलग नहीं होना चाहता। मन के इसी गहरे खिंचाव और मोह के कारण इंसान को बार-बार अनेक योनियों में जन्म लेना पड़ता है और घोर कष्ट सहने पड़ते हैं। यह दोहा हमें समझाता है कि जब तक मन सांसारिक वासनाओं में उलझा रहेगा, तब तक दुखों का अंत नहीं हो सकता। सच्ची शांति बाहरी आकर्षणों में डूबने से नहीं, बल्कि मन को मोह से मुक्त कर अंतर्मन को साधने से मिलती है।
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