कोटिहुँ मुख कहि जायँ न प्रभु के एक एक उपकार । तदपि नाथ कछु और माँगिहौं दीजै परम उदार ॥

“Though myriad tongues could not recount each grace of Thine divine, / Yet still I beg for something more, most gracious Lord of mine.”

— तुलसीदास
अर्थ

करोड़ों मुखों से भी प्रभु के एक-एक उपकार का वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर भी हे परम उदार नाथ! मैं आपसे कुछ और माँगता हूँ, कृपा कर मुझे प्रदान कीजिए।

विस्तार

यह दोहा भक्त और ईश्वर के बीच के पावन और आत्मीय संबंध को दर्शाता है। भक्त कहता है कि हे प्रभु, यदि मेरे पास करोड़ों मुख भी हों, तब भी मैं आपके अनगिनत उपकारों का वर्णन नहीं कर सकता। आपकी दया और कृपा इतनी अपार है कि शब्दों में नहीं समा सकती। फिर भी, आपके अत्यंत उदार स्वभाव को जानकर, मैं आपसे कुछ और माँगने का भाव रखता हूँ। यह कोई लालच नहीं है, बल्कि एक बच्चे का अपने पिता पर सच्चा विश्वास और अधिकार है। यह वाणी हमें सिखाती है कि ईश्वर की असीम करुणा पर भरोसा रखते हुए हम सदा प्रेम और कृपा की प्रार्थना कर सकते हैं।

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