ग़ज़ल
ठहराव की थकान
ٹھہراؤ کی تھکن
यह ग़ज़ल जीवन की यात्रा से उत्पन्न गहरी थकावट और पथ पर आगे बढ़ने की उत्कट इच्छा को दर्शाती है। इसमें एक ऐसी निरंतर बेचैनी का वर्णन है जहाँ न अँधेरा सुकून देता है और न ही प्रकाश शांति लाता है, दोनों ही पीड़ादायक हैं। यह एक आत्मा की चिरस्थायी अशांति को व्यक्त करती है, जिसे कहीं भी ठहराव नहीं मिलता, और शांति की संभावना भी बेचैनी में बदल जाती है।
गीत सुनें
1
ભટકી ભટકીને મારા થાકયા છે પાય
હવે પંથ મારો ચાલે તો ચાલુ:
भटक-भटक कर मेरे पैर थक गए हैं। अब यदि मेरा मार्ग आगे बढ़ेगा, तो मैं चलूँगा।
2
પોપચાં બિડાય ત્યારે ખૂંચે અંધાર
અને ઊઘડે ત્યાં સળગે અજવાળુ;
जब पलकें बंद होती हैं, तो अँधेरा भीतर चुभता है; और जब वे खुलती हैं, तो प्रकाश जल उठता है।
3
વેદનાનુ નામ કયાંય હોય નહીં એમ જાણે
વેરી દઉં હોશભેર વાત;
मानो वेदना का कहीं कोई नाम ही न हो; मैं होशपूर्वक अपनी बातें बिखेर देता हूँ।
4
જંપ નહીં જીવને આ એનો અજંપો
ને ચેનથી બેચેન થાય રાત.
जीव को शांति नहीं मिलती, यह उसकी बेचैनी है, और चैन से ही रात बेचैन हो जाती है।
5
અટકે જો આંસુ તો ખટકે; ને લ્હાય મને
થીજેલાં બિંદુઓ જો ખાળું!
अगर आँसू रुकते हैं तो वे चुभते हैं; और मुझे आग लग जाती है, यदि मैं इन जमे हुए बूँदों को रोके रखूँ!
6
સોસવાતો જાઉં છું સંગના વેરાનમાં
ને મારે એકાન્ત હું અવાક;
मैं संगति के वीरान में घुलता जा रहा हूँ, और अपने एकांत में मैं अवाक् हूँ।
7
આઘે જવાના કોઈ ઓરતા નહીં ને અહીં
થોભ્યાનો લાગે છે થાક.
दूर जाने की कोई इच्छा नहीं है, और यहीं रुकने का एहसास थका देने वाला लगता है।
8
આંખડીના પાણીને રોકી રોકીને, કહો-
કેમ કરી સ્મિતને સંભાળું?
मैं अपनी आँखों के आँसुओं को बार-बार रोककर पूछता हूँ, कि मैं अपनी मुस्कान को कैसे बनाए रखूँ?
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