ग़ज़ल
नाला इस ज़ोर से क्यों मीर अधाई देता
نالا اس زور سے کیوں میر ادہائی دیتا
Source: Deewan-e-Zauq (1923) · HI
गीत सुनें
1
नाला इस ज़ोर से क्यों मीर अधाई देता
इसे फ़लक तू अगर मुझ को न सुनाई देता
ऐ आसमान, मीर यह विलाप इतने ज़ोर से क्यों करता, अगर तूने इसे मुझे न सुनाया होता।
2
देख छोटों को रहे अंधेराई देता
आसमान आँख से तिल में है दिखाई देता
देखो, यह छोटों पर अंधेरा डालता रहता है; फिर भी सारा आसमान आँख के एक छोटे से तिल में दिखाई देता है।
3
लाख देता फ़लक आज़ार गवारा थे मगर
एक तेरा न मुझे दर्द-ए-जुदाई देता
आसमान मुझे लाख तकलीफ़ें देता तो मैं सह लेता, मगर काश वह मुझे तुझसे जुदाई का यह एक दर्द न देता।
4
दे दुआ वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-जुनूँ को हर गाम
दाद ये तेरी मत आबला-पाई देता
हर क़दम पर जुनून की उस कँटीली वादी को दुआ दो, क्योंकि तुम्हारी इस छालों भरी आवारगी की दाद और कोई इतनी अच्छी तरह नहीं दे सकता था।
5
पंजा-ए-मिहर को ख़ून-ए-शफ़क़ में हर सुब्ह
ख़ू बारी क्या है तेरा दस्त-ए-हिनाई देता
हर सुबह सूरज के पंजे को शफ़क़ के ख़ून में डुबो देना—यह ख़ूँरेज़ी तेरे हिना-रचे हाथ की ही देन है।
6
मदवश अश्क गिरा देन गे नज़र से इक दिन
है अज़ल आँख इन से यही मुझ को सुझाई देता
मस्ती में चूर ये आँखें एक दिन मेरी नज़र से आँसू गिरा देंगी; शुरू से ही ये आँखें मुझे बस यही बात दिखाती रही हैं।
7
मैं वो हूँ सैद कि फिर इस में फँसता को आ
तू क़फ़स से मुझे सद बार रिहाई देता
मैं वह शिकार हूँ जो दोबारा इसी जाल में फँसने आ जाता, चाहे तू पिंजरे से मुझे सौ बार आज़ाद क्यों न कर देता।
8
कौन घर आईना के आता अगर वो दिल में
ख़ाकसारों से न जारूब-ए-सफ़ाई देता
आईने के घर कौन आता, अगर वह दिल में बसा होता; अगर वह विनम्र लोगों को सफ़ाई की झाड़ू न देता।
9
ख़ूगर-ए-नाज़ हूँ किस का कि मुझे साग़र-ए-मय
बोसा-ए-लब नहीं बे-चश्म-नुमाई देता
मैं किसके नाज़ो-अंदाज़ का इतना आदी हो गया हूँ कि शराब का प्याला भी मुझे अपने होंठ का बोसा बिना आँख दिखाए, बिना नख़रे किए नहीं देता।
10
मुँह से बस करते न हरगिज़ ये ख़ुदा के बंदे
गर हिर्सों को ख़ुदा सारी ख़ुदाई देता
ख़ुदा के ये बंदे अपने मुँह से कभी 'बस' नहीं कहते; अगर ख़ुदा लालची लोगों को सारी ख़ुदाई भी दे दे, तो भी वे संतुष्ट नहीं होते।
11
देख कर देखना है ज़ौक़ कि वो पर्दा-नशीन
दीदा-ए-रौज़न-ए-दिल से है दिखाई देता
ऐ ज़ौक़, उस परदानशीन को देख-देख कर देखने का कितना आनंद है कि वह दिल के रौशनदान रूपी आँख से दिखाई देती है।
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