देख कर देखना है ज़ौक़ कि वो पर्दा-नशीन — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
“To behold is but a joy, Zauq, that veiled beloved of mine Through the eye of the heart's lattice she is seen, divine.”
अर्थ
ऐ ज़ौक़, उस परदानशीन को देख-देख कर देखने का कितना आनंद है कि वह दिल के रौशनदान रूपी आँख से दिखाई देती है।
विस्तार
ज़ौक़ यहाँ एक नाज़ुक बात कहते हैं। महबूब पर्दा-नशीन है, पर्दे के पीछे छिपा हुआ, आँखों के सामने खुलकर नहीं आता। फिर भी वे कहते हैं, ग़ौर से देखो, सचमुच देखो। वह पर्दा-नशीन आज भी दिखाई देता है, मगर आम आँखों से नहीं, बल्कि दिल के झरोखे से। दिल की अपनी एक आँख होती है, और वही भीतरी नज़र उसे पा लेती है जहाँ बाहरी आँखें नहीं पहुँचतीं। इसलिए इश्क़ हमें देखने का एक अलग तरीक़ा सिखाता है। जब चेहरा दुनिया से छिपा हो, तब भी प्रेम करने वाला दिल महबूब को साफ़ देखता रहता है। असली देखना, ज़ौक़ याद दिलाते हैं, भीतर ही होता है।
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