दे दुआ वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-जुनूँ को हर गाम — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

दे दुआ वादी-ए-पुर-ख़ार-ए-जुनूँ को हर गाम दाद ये तेरी मत आबला-पाई देता

“At every step bless the thorn-strewn valley of frenzy— no other could reward this blistered wandering of yours so well.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

हर क़दम पर जुनून की उस कँटीली वादी को दुआ दो, क्योंकि तुम्हारी इस छालों भरी आवारगी की दाद और कोई इतनी अच्छी तरह नहीं दे सकता था।

विस्तार

शायर खुद से कोमल कृतज्ञता के साथ कहता है कि जुनून की उस कँटीली वादी को हर कदम पर दुआ दो। क्यों? क्योंकि उसी मुश्किल और दर्द भरे रास्ते ने तुम्हारे छालों से भरे पैरों को पहचान और कीमत दी। जिन कांटों ने तुम्हें घायल किया, वही असल में तुम्हारे सफर को सम्मान देने वाले थे। अगर उस पागलपन और इश्क़ की जंगली राह पर नंगे पैर चलने का दर्द न होता, तो तुम्हारी मेहनत कोई न पहचानता। इसलिए तकलीफ की शिकायत करने के बजाय उसका शुक्रिया अदा करो। उसी पीड़ा ने तुम्हारी दीवानगी को अर्थ और प्रशंसा दी। कुल मिलाकर, जो मुश्किलें हम झेलते हैं, वही अक्सर हमारी असली पहचान बन जाती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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