“The eye of Moses could not endure the radiance of a single manifestation, yet through the eye of the heart, I have beheld Him time and again, so clearly.”
हज़रत मूसा की आँख उसके केवल एक जल्वे की चमक भी सहन न कर सकी, जबकि मैंने उसी को अपने दिल की आँख से कई बार भली-भाँति देखा है।
इस शेर में कोह-ए-तूर की मशहूर रिवायत का ज़िक्र है, जहाँ हज़रत मूसा ख़ुदा के नूर की एक झलक भी बर्दाश्त न कर सके और बेहोश हो गए। शायर कहता है कि जिस जमाल को बाहरी आँखें नहीं देख सकीं, उसे उसने अपनी 'चश्म-ए-दिल' यानी दिल की नज़र से बार-बार और बेहद क़रीब से देखा है। इसका गहरा पैग़ाम यह है कि ईश्वर को ज़ाहिरी दुनिया में ढूँढने के बजाय अगर दिल की गहराइयों और सच्चे इश्क़ से तलाशा जाए, तो उसका दीदार हर पल मुमकिन है।
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