ग़ज़ल
एक ही जल्वा-ए-मह्रू में हुआ सौ नगरी
ایک ہی جلوۂ مہرو میں ہوا سو نگری
Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI
गीत सुनें
1
एक ही जल्वा-ए-मह्रू में हुआ सौ नगरी
जामा-ए-सब्र हिसी कहती हैं किस्तान होगा
उस सुंदर चेहरे की एक ही झलक में सैकड़ों नगर बस गए; सब्र का वस्त्र फट गया और कहते हैं कि यही विनाश का कारण होगा।
2
गर यही गर्मी-ए-मज़मून शरर-रेज़ रहे
रिश्ता-ए-शमा सी शीराज़ा-ए-दीवान होगा
अगर मेरे विषय की यही गर्मी इसी तरह चिंगारियाँ बिखेरती रही, तो मेरे दीवान की जिल्दबंदी मोमबत्ती की जलती हुई बत्ती के समान हो जाएगी।
3
क्योंकर उम्मीद-ए-वफ़ा सी हो तसल्ली दिल को
फ़िक्र ही यह कि वो वादा सी पशेमान होगा
दिल को वफ़ा की उम्मीद से भला कैसे तसल्ली मिले, जब बस यही फ़िक्र है कि वो अपने वादे से पछताएगा।
4
गर तेरी खंजर-ए-मिज़गान नी किया क़त्ल मुझी
ग़ैर क्या क्या मलक-उल-मौत की क़ुर्बान होगा
अगर तेरी खंजर जैसी पलकों ने मुझे पूरी तरह क़त्ल न किया, तो फिर मौत के फ़रिश्ते का क्या काम और वह किस पर क़ुर्बान होगा।
5
अपनी अंदाज़ की भी एक ग़ज़ल पढ़ मोमिन
आख़िर इस बज़्म में कोई तो सुख़न्दान होगा
ऐ मोमिन, अपने अंदाज़ की भी एक ग़ज़ल पढ़ो; आख़िर इस महफ़िल में कोई न कोई तो सुख़न को पहचानने वाला होगा।
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