गर यही गर्मी-ए-मज़मून शरर-रेज़ रहे — मोमिन ख़ाँ मोमिन

गर यही गर्मी-ए-मज़मून शरर-रेज़ रहे रिश्ता-ए-शमा सी शीराज़ा-ए-दीवान होगा

“If this fiery heat of theme keeps scattering sparks, The binding of my verse-collection will be a candle's wick aflame.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

अगर मेरे विषय की यही गर्मी इसी तरह चिंगारियाँ बिखेरती रही, तो मेरे दीवान की जिल्दबंदी मोमबत्ती की जलती हुई बत्ती के समान हो जाएगी।

विस्तार

शायर अपनी शायरी को इतनी जोशीली और आग से भरी बताता है कि वह किताब के पन्नों को ही जला सकती है। वह कहता है कि अगर उसके विषयों की यही गर्मी इसी तरह चिंगारियाँ बिखेरती रही, तो उसके दीवान की जिल्दबंदी का धागा मोमबत्ती की बाती से बनाना पड़ेगा। यानी उसके शब्द इतने तेज़ और दहकते हुए हैं कि कोई साधारण बंधन उन्हें थाम नहीं सकता। सिर्फ़ आग से जन्मी कोई चीज़ ही ऐसी जलती हुई शायरी को एक साथ बाँध सकती है। यह अपनी ही शायरी की आग भरी ताक़त का गर्व और चंचल अंदाज़ में जश्न है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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