ग़ज़ल

बे-सबब क्यूँकर लब-ए-ज़ख़्म पर अफ़ग़ान होगा

بی سبب کیونکر لب زخم پر افغان ہوگا

Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
बे-सबब क्यूँकर लब-ए-ज़ख़्म पर अफ़ग़ान होगा शोर-ए-महशर से भरा उसका नमकदान होगा
बिना किसी कारण के ज़ख़्म का किनारा कैसे चीख़ उठेगा; उसका नमकदान तो क़यामत के शोर से भरा हुआ होगा।
2
आख़िर उम्मीद ही से चारा-ए-हिर्मान होगा मर्ग की आस पे जीना शब-ए-हिजरान होगा
आख़िरकार उम्मीद ही से निराशा का इलाज होगा; मौत की आस पर जीना ही जुदाई की रात को काटना होगा।
3
मजमा-ए-बस्ता-ए-महमिल शब-ए-अनम याद आया ताले-ए-ख़ुफ़्ता का क्या ख़्वाब-ए-परेशाँ होगा
मुझे वह बँधी हुई महमिल की जमघट और पड़ाव की वह रात याद आ गई; भला सोए हुए नसीब का ख़्वाब कितना परेशान होगा।
4
दिल में शौक़-ए-रुख़-ए-रौशन न छुपेगा हरगिज़ माह पर्दे में कतान के कोई पिन्हाँ होगा
उस रौशन चेहरे को देखने की चाहत दिल में कभी छुप नहीं सकती—भला चाँद कहीं महीन कपड़े के परदे में छुपा रह सकता है?
5
दर्द है जान के एवज़ हर रग-ओ-पै में सारी चारागर हम नहीं होने के जो दरमान होगा
हर नस और रग में जान के बदले सिर्फ़ दर्द बसा हुआ है; ऐ चारागर, हम ऐसे हैं कि अब कोई इलाज या दवा हमें ठीक नहीं कर सकती।
6
शोमी-ए-बख़्त तू ही छीन ले मेरी हशत-ए-दिल देख ज़िन्दान है कोई न मैं बियाबान होगा
ऐ दुर्भाग्य, तू ही मेरे दिल का भय छीन ले; देख, यहाँ कोई कैद नहीं है, वरना मैं एक वीराना बन जाता।
7
निस्बत-ए-ऐश से हूँ नज़ा में गिर्यां यानी है यह रोना कि दहन गोर का ख़न्दान होगा
सुख-आनंद के सम्बन्ध में मैं मृत्यु की पीड़ा में रो रहा हूँ, अर्थात् यह रोना ऐसा है कि इससे क़ब्र का मुँह हँस पड़ेगा।
8
बात करने में रक़ीबों की ही टूट गया दिल भी शायद उसी बद-अहद का पैमान होगा
रक़ीबों की बातें करते-करते ही यह टूट गया; शायद मेरा दिल भी उसी वादा-तोड़ने वाले का कोई अहद-ओ-पैमान था।
9
चारा-जू और भी चारागरी गा नगरी पर्दा-ए-शोख़ जो पैवन्द-ए-गरेबान होगा
चारासाज़ और भी इलाज तलाश करेगा, ऐ ज़ख़्मों की नगरी, जब शोख़ी का पर्दा फटे हुए गरेबान का पैवन्द बन जाएगा।
10
दोस्ती उस सनम-ए-आफ़त-ए-ईमान से करे मोमिन अब भी कोई दुश्मन-ए-ईमान होगा
क्या कोई मोमिन अब भी उस बुत से दोस्ती करेगा जो ईमान के लिए आफ़त है? ऐसा तो बस ईमान का दुश्मन ही कर सकता है।
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