ग़ज़ल
यार मेरा बहुत है यार-फ़रेब
यार मेरा बहुत है यार-फ़रेब
यह ग़ज़ल एक धोखेबाज़ प्रेम और जीवन की अस्थिरता पर आधारित है, जिसमें वक्ता बताता है कि हर रिश्ते और वादे में धोखा छिपा है। यह प्रेम के भ्रम और दुनिया की नश्वरता के कारण आशिक़ को गहरी निराशा और चेतावनी का भाव व्यक्त करती है।
गीत सुनें
1
यार मेरा बहुत है यार-फ़रेब
मक्र है अहद सब क़रार-फ़रेब
यार, मेरी दोस्ती में बहुत धोखा है; हर वादा एक झूठा भ्रम है।
2
राह रखते हैं उस के दाम से सैद
है बला कोई वो शिकार-फ़रेब
राह रखते हैं उस के दाम से सैद,
है बला कोई वो शिकार-फ़रेब।
(अर्थात, सैद व्यक्ति के मूल्य का निर्धारण नियति करती है; वह किसी जादू, अभिशाप, शिकार या धोखे का पात्र नहीं है।)
3
ओहदे से निकलें किस तरह आशिक़
एक अदा उस की है हज़ार-फ़रेब
शायर पूछता है कि वह किस तरह इस अवस्था से निकल सकता है, क्योंकि उसकी एक अदा में हज़ार तरह के छल छिपे हैं।
4
इल्तिफ़ात-ए-ज़माना पर मत जा
'मीर' देता है रोज़गार-फ़रेब
दुनिया की मेहरबानी पर भरोसा मत करना, 'मीर' कहता है कि यह केवल एक झूठा रोज़गार है।
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