ग़ज़ल
शायद उस सादा ने रखा है ख़त
शायद उस सादा ने रखा है ख़त
यह ग़ज़ल एक अनजाने या सादे व्यक्ति द्वारा रखे गए ख़त के इर्द-गिर्द घूमती है। यह ख़त एक गहरे और रहस्यमय प्रेम या लगाव की कहानी कहता है, जिसे शायद किसी ने शौक से या दूर से ही लिखा है। शायर उस ख़त के रहस्य और उसके निहित संदेशों पर विचार करते हैं।
गीत सुनें
1
शायद उस सादा ने रखा है ख़त
कि हमें मुत्तसिल लिक्खा है ख़त
शायद उस सादे ने ख़त रखा है, कि हमें लगातार ख़त लिखा है।
2
शौक़ से बात बढ़ गई थी बहुत
दफ़्तर उस को लिखें हैं क्या है ख़त
शौक़ से बात बहुत बढ़ गई थी, अब दफ़्तर में उसे क्या लिखना है ख़त।
3
नामा कब यार ने पढ़ा सारा
न कहा ये भी आश्ना है ख़त
दोस्त ने सारे नाम पढ़कर सुनाए, पर ख़त में यह नहीं कहा कि 'मैं भी आशना हूँ।'
4
साथ हम भी गए हैं दूर तलक
जब उधर के तईं चला है ख़त
अर्थ यह है कि हम भी बहुत दूर तक गए हैं, जब वह ख़त उस जगह पहुँचा है जो बहुत दूर है।
5
कुछ ख़लल राह में हुआ ऐ 'मीर'
नामा-बर कब से ले गया है ख़त
कुछ गड़बड़ी रास्ते में हो गई, ऐ मीर। नाम-बर कब से मेरा ख़त लेकर चला गया?
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