ग़ज़ल

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या

क्या प्रेम के पथ पर रोना उचित है? क्या आगे बढ़ने से कुछ नया होता है? यह धरती कभी हरी-भरी नहीं होगी, और क्या तुम मन में इच्छाओं के बीज बोते रहोगे? यह प्रेम के निशान हैं जो मिटते नहीं, क्या ये छाती के दाग धो देंगे।

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या आगे आगे देखिए होता है क्या
दूर के इश्क़ के रास्ते पर रोते क्यों हो? आगे-आगे देखो, क्या होता है।
2
क़ाफ़िले में सुब्ह के इक शोर है या'नी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या
काफ़िले में सुबह का एक शोर है, यानी क्या ग़ाफ़िल हम चलते-चलते सो गया है।
3
सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं तुख़्म-ए-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या
यह ज़मीन कभी उपजाऊ नहीं होती, या क्या तुम दिल में ख्वाहिश के बीज बोते हो।
4
ये निशान-ए-इश्क़ हैं जाते नहीं दाग़ छाती के अबस धोता है क्या
ये इश्क़ के निशान हैं जो मिटते नहीं, छाती के दाग़ अब किससे धोए जाएँगे।
5
ग़ैरत-ए-यूसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़ 'मीर' उस को राएगाँ खोता है क्या
ये वक़्त-ए-अज़ीज़ ग़ैरत-ए-यूसुफ़ है, 'मीर' उस को राएगाँ खोता है क्या?
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