ग़ैरत-ए-यूसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़ — मीर तक़ी मीर
ग़ैरत-ए-यूसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़
'मीर' उस को राएगाँ खोता है क्या
“This is the pride of Joseph in this precious time, 'Mir,' are you going to lose him for nothing?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
ये वक़्त-ए-अज़ीज़ ग़ैरत-ए-यूसुफ़ है, 'मीर' उस को राएगाँ खोता है क्या?
विस्तार
यह शेर एक वक़्त की अहमियत और अपनी इज़्ज़त को बनाए रखने की बात करता है। शायर कहते हैं कि ये वक़्त यूसुफ़ की ग़ैरत जैसा क़ीमती है। और फिर वो पूछते हैं—क्या मैं इस वक़्त को या इस रिश्ते को, किसी आवारा कुत्ते की तरह खो दूँगा?! यह एक आत्म-सवाल है, एक आगाह करना है कि हमें अपनी क़ीमत पहचाननी होगी।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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