सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं — मीर तक़ी मीर
सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्म-ए-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या
“This land never becomes fertile, Or do you sow the seeds of desire in the heart?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
यह ज़मीन कभी उपजाऊ नहीं होती, या क्या तुम दिल में ख्वाहिश के बीज बोते हो।
विस्तार
यह शेर सिर्फ ज़मीन की बात नहीं करता, ये दिल की बात करता है। शायर पूछ रहे हैं कि यह मन, यह ज़िंदगी... कभी हरी-भरी नहीं होगी। आप अपने दिल में जो ख़्वाहिशों के बीज बोते हैं न, वो क्या करेंगे? वो कोई जीवन नहीं लाएंगी, बस एक दर्दनाक एहसास को ज़िंदा रख देंगी। यह एक गहरा, उदास तफ़क्कुर है कि कभी-कभी चाहत ही सबसे बड़ी तकलीफ़ बन जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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