ग़ज़ल
दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं
दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं
यह ग़ज़ल समय और प्रेम की जटिल, अनिश्चित प्रकृति का वर्णन करती है। शायर कहता है कि समय की कोई निश्चित सीमा नहीं है, और प्रेम की प्राप्ति भी एक ऐसे समय पर होती है जो कभी नहीं आता। यह वफ़ा और तड़प के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
गीत सुनें
1
दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं
वक़्त मिलने का मगर दाख़िल-ए-अय्याम नहीं
दिन नहीं, रात नहीं, सुबह नहीं, शाम नहीं; वक़्त मिलने का मगर दाख़िल-ए-अय्याम नहीं।
2
मिस्ल अन्क़ा मुझे तुम दूर से सुन लो वर्ना
नंग-ए-हस्ती हूँ मिरी जाए ब-जुज़ नाम नहीं
दोस्त, मेरी कहानी को दूर से सुनना, वरना मेरा अस्तित्व केवल नाम के सिवा ही नग्न हो जाएगा।
3
ख़तर राह-ए-वफ़ा बल्कि बहुत दूर खिंचा
उम्र गुज़री कि बहम नामा-ओ-पैग़ाम नहीं
वफ़ा का रास्ता ख़तरनाक नहीं था, बल्कि बहुत दूर तक खिंच गया; मैंने अपनी ज़िंदगी बिना किसी खबर या संदेश के गुज़ार दी।
4
राज़-पोशी-ए-मोहब्बत के तईं चाहिए ज़ब्त
सो तो बे-ताबी-ए-दिल बिन मुझे आराम नहीं
प्रेम का रहस्य संयम मांगता है, लेकिन यदि मैं दिल की बेचैनी के बिना सोता हूँ, तो मुझे शांति नहीं मिलती।
5
बे-क़रारी जो कोई देखे है सो कहता है
कुछ तो है 'मीर' कि इक दम तुझे आराम नहीं
जो कोई बे-क़रारी को देखे, वह कहता है कि 'मीर' में कुछ ऐसा है कि उसे जरा भी आराम नहीं मिलता।
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