दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं — मीर तक़ी मीर

दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं वक़्त मिलने का मगर दाख़िल-ए-अय्याम नहीं

“Neither day nor night, nor morning, nor evening, But the time to meet, is not within the days.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

दिन नहीं, रात नहीं, सुबह नहीं, शाम नहीं; वक़्त मिलने का मगर दाख़िल-ए-अय्याम नहीं।

विस्तार

यह शेर एक ऐसे दर्द को बयां करता है जहाँ वक़्त का गुजरना भी बेमानी हो गया है। शायर कहते हैं कि न दिन का एहसास है, न रात का, न सुबह का, न शाम का। यह सिर्फ़ वक़्त का थम जाना नहीं है, बल्कि एक गहरी निराशा है कि जीवन के अनुभव के द्वार भी बंद हैं। यह अलगाव और एक अनकहे दर्द का इज़हार है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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