ग़ज़ल
इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़अ'
इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़अ'
यह ग़ज़ल प्रेम की शक्ति का बखान करती है, यह कहती है कि प्रेम का प्रभाव किसी दवा या बाहरी साधन से नहीं हो सकता। शायर कहते हैं कि अब किसी बाहरी स्रोत से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, बल्कि केवल ईश्वर या अपने आंतरिक विश्वास पर निर्भर रहना चाहिए। यह प्रेम की पवित्रता और उसकी अलौकिक शक्ति को दर्शाती है।
गीत सुनें
1
इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़अ'
कुढि़ए कब तक न हो बला से नफ़अ'
इश्क़ में कोई दवा काम नहीं आती; कब तक इस मुसीबत से छुटकारा नहीं मिलेगा।
2
कब तलक इन बुतों से चश्म रहे
हो रहेगा बस अब ख़ुदा से नफ़अ'
शायर कह रहा है कि तू कब तक इन झूठे देवताओं से सहारा लेती रहेगी? अब तो केवल खुदा से ही फ़ायदा मिलेगा।
3
मैं तो ग़ैर अज़ ज़रर न देखा कुछ
ढूँढो तुम यार ओ आश्ना से नफ़अ'
शायर कहता है कि उसने कभी किसी बाहरी व्यक्ति के अलावा कोई शक्ति नहीं देखी। वह कहता है कि अपने प्रियजन या मित्र से कोई लाभ नहीं ढूंढना चाहिए।
4
मुग़्तनिम जान गर किसू के तईं
पहुँचे है तेरे दस्त ओ पा से नफ़अ'
हे मेरे प्रिय, यदि तुमने किसी के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है, तो तुम्हारे हाथों और पैरों से कोई लाभ नहीं है।
5
अब फ़क़ीरों से कह हक़ीक़त-ए-दिल
'मीर' शायद कि हो दुआ से नफ़अ'
अब फ़क़ीरों से कह दिल का सच, 'मीर', शायद दुआ से कोई फ़ायदा न हो।
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