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ग़ज़ल

दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला

दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला

यह ग़ज़ल दिल के वियोग और इश्क़ की आग का वर्णन करती है, जो पूरे शरीर को जला देती है। शायर कहता है कि यह आग इतनी तीव्र है कि इसने वस्त्र और जीवन दोनों को जला दिया है, और वह अब इस पीड़ा से मुक्ति चाहता है।

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1
दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला पड़ी ये ऐसी चिंगारी कि पैराहन जला
जब तुम मेरे दिल में पहुँचे, तब से मेरा सारा तन जल गया; / ऐसी चिंगारी आ पड़ी कि मेरे वस्त्र जल गए।
2
सरकशी ही है जो दिखलाती है इस मज्लिस में दाग़ हो सके तो शम्अ साँ दीजे रग-ए-गर्दन जला
सरकशी वह है जो इस महफ़िल में दाग़ दिखा देती है; काश, दीये की लौ से मेरी गर्दन की नस जल जाए।
3
बद्र साँ अब आख़िर आख़िर छा गई मुझ पर ये आग वर्ना पहले था मिरा जूँ माह नौ दामन जला
बद्र साँ, अब आख़िरकार मुझ पर यह आग लग गई है, वरना पहले तो मेरे नौ दामन जल गए थे।
4
कब तलक धूनी लगाए जोगियों की सी रहूँ बैठे बैठे दर पे तेरे तो मिरा आसन जला
मैं कब तक जोगियों की तरह धूनी लगाए बैठा रहूँ? तेरे दर पर बैठे-बैठे मेरा आसन जल गया।
5
गर्मी उस आतिश के पर काले से रखे चश्म तब जब कोई मेरी तरह से देवे सब तन मन जला
जब काले फ्रेम का चश्मा उस आग की गर्मी से बचा रहे, तब जब कोई मेरे जैसा मेरा तन-मन जला दे।
6
हो जो मिन्नत से तो क्या वो शब नशीनी बाग़ की काट अपनी रात को ख़ार-ओ-ख़स-ए-गुलख़न जला
अगर मिन्नत से नहीं, तो वह रात गुज़ारने वाला बाग़ अपनी रात को खुशबूदार गुलाब की काँटों और मख़मली सुगंध से जला दे।
7
सूखते ही आँसुओं के नूर आँखों का गया बुझ ही जाते हैं दिए जिस वक़्त सब रोग़न जला
आँसुओं के नूर का सूख जाना उस समय जैसा है जब दिए में सारा तेल जल जाता है।
8
शोला अफ़्शानी नहीं ये कुछ नई इस आह से दूँ लगी है ऐसी ऐसी भी कि सारा बन जला
यह शोला अफ़शानी नहीं, यह कुछ नई इस आह से दूँ लगी है, ऐसी ऐसी भी कि सारा बन जला।
9
आग सी इक दिल में सुलगे है कभू भड़की तो 'मीर' देगी मेरी हड्डियों का ढेर जूँ ईंधन जला
मेरे दिल में एक आग जल उठी है, जो कभी भड़की नहीं है; अगर यह भड़केगी, तो 'मीर' मेरी हड्डियों का ढेर ईंधन के रूप में देगी।
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