ग़ज़ल
कबीर संग्रह 81-86
کبیر سنگرہ 81-86
कबीर अपने दोहों में तत्कालीन समाज के पाखंड और नैतिक पतन पर तीखा कटाक्ष करते हैं। वे कहते हैं कि ब्राह्मण केवल वेदों में उलझे हैं और कलियुग में सच्चे साधु दुर्लभ हो गए हैं, जहाँ लोभी-लालची लोगों को सम्मान मिलता है। कबीर तीर्थयात्रा जैसे बाहरी कर्मकांडों को व्यर्थ बताते हुए सच्ची समझ और आंतरिक शुद्धता पर बल देते हैं।
गीत सुनें
1
ब्राह्म्ण गुरु जगत् का , साधू का गुरु नाहिं। उरझि-पुरझि करि भरि रह्मा , चारिउं बेदा मांहि॥
ब्रह्म और संसार ही गुरु हैं; संत का कोई गुरु नहीं है। दिन-रात मन में व्याकुलता भरकर, चारों वेदों को समाए रखा गया है।
2
कबीर कलि खोटी भई , मुनियर मिलै न कोइ। लालच लोभी मसकरा , तिनकूँ आदर होइ॥
कबीर कहते हैं कि यह कलियुग झूठा है, जिसमें कोई सच्चा और पवित्र व्यक्ति नहीं मिलता। लालची और लोभी व्यक्ति को कोई आदर नहीं करना चाहिए।
3
कलि का स्वमी लोभिया , मनसा घरी बधाई। दैंहि पईसा ब्याज़ को , लेखां करता जाई॥ 296॥ कबीर इस संसार कौ , समझाऊँ कै बार। पूँछ जो पकड़ै भेड़ की उतर या चाहे पार॥
कलि का स्वामी लोभिया है, जो मनसा के घर बधाई देता है। वह ब्याज के पैसे लेकर लगातार हिसाब करता रहता है। शायर कहते हैं कि मैं संसार को बार-बार समझाता हूँ कि जो भेड़ की पूँछ पकड़ता है, न उतर सकता है और न पार कर सकता है।
4
तीरथ करि-करि जग मुवा , डूंधै पाणी न्हाइ। रामहि राम जपतंडां , काल घसीटया जाइ॥
जग में तीर्थ-यात्रा करके मनुष्य पानी में स्नान करना चाहता है, परंतु राम का नाम जपने से समय धीरे-धीरे बीतता है।
5
चतुराई सूवै पढ़ी , सोइ पंजर मांहि। फिरि प्रमोधै आन कौं , आपण समझे नाहिं॥
जो चतुराई केवल पढ़ी जाए, वह शरीर के भीतर ही रहती है। यह नहीं समझा जा सकता कि वह दूसरों को कितना दुःख पहुंचाती है।
6
कबीर मन फूल्या फिरै , करता हूँ मैं घ्रंम। कोटि क्रम सिरि ले चल्या , चेत न देखै भ्रम॥
कबीर का मन भटकता रहता है, और मैं भ्रम में पड़ जाता हूँ। यह मन अनगिनत रूप और पथ लेकर भटकता है, और किसी भ्रम को नहीं देखता।
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