ब्राह्म्ण गुरु जगत् का , साधू का गुरु नाहिं। उरझि-पुरझि करि भरि रह्मा , चारिउं बेदा मांहि॥ — कबीर
“The Brahman is the Guru, the world is the Guru; the Guru of the saint is not there. Day and night, filling the heart with longing, the four Vedas are contained within.”
अर्थ
ब्रह्म और संसार ही गुरु हैं; संत का कोई गुरु नहीं है। दिन-रात मन में व्याकुलता भरकर, चारों वेदों को समाए रखा गया है।
विस्तार
यह दोहा हमें समझाता है कि जहाँ ब्राह्मण दुनिया को धर्मग्रंथों और कर्मकांडों के माध्यम से रास्ता दिखाते हैं, वहीं एक सच्चे संत का गुरु कोई बाहरी व्यक्ति नहीं होता, बल्कि उनकी अपनी अंतरात्मा होती है। चारों वेद, अपनी सभी उलझनों और ज्ञान के साथ, अंततः इसी गहरे सत्य को प्रकट करते हैं कि असली मार्गदर्शन भीतर ही छिपा है। यह हमें बाहरी ज्ञान से हटकर अपनी आंतरिक समझ पर भरोसा करने की प्रेरणा देता है।
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