चतुराई सूवै पढ़ी , सोइ पंजर मांहि। फिरि प्रमोधै आन कौं , आपण समझे नाहिं॥ — कबीर
“The cleverness that is read, is within the body's frame. What sorrow it brings to others, one does not understand.”
अर्थ
जो चतुराई केवल पढ़ी जाए, वह शरीर के भीतर ही रहती है। यह नहीं समझा जा सकता कि वह दूसरों को कितना दुःख पहुंचाती है।
विस्तार
कबीर दास जी यहाँ कितनी प्यारी बात कह रहे हैं! वे कहते हैं कि जो चतुराई या ज्ञान हम बाहर से सीखते हैं, वह तो बस शरीर के पिंजरे में बंद एक तोते जैसा है। हम दूसरों को तो ज्ञान बांटते फिरते हैं, पर अपनी ही गलतियों या दूसरों पर पड़ने वाले हमारे बुरे प्रभाव को समझ नहीं पाते। सच्चा ज्ञान तो भीतर की ओर मुड़कर ही मिलता है, जब हम अपने आप को समझते हैं।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
