कलि का स्वमी लोभिया , मनसा घरी बधाई। दैंहि पईसा ब्याज़ को , लेखां करता जाई॥ 296॥ कबीर इस संसार कौ , समझाऊँ कै बार। पूँछ जो पकड़ै भेड़ की उतर या चाहे पार॥ — कबीर
“The master of Kali is Lobhiya, who congratulates at Manasa's home. He takes money for interest, keeping accounts continually. I tell you, O world, this truth again and again. The one who grasps the sheep's tail, either cannot cross or desires to cross.”
अर्थ
कलि का स्वामी लोभिया है, जो मनसा के घर बधाई देता है। वह ब्याज के पैसे लेकर लगातार हिसाब करता रहता है। शायर कहते हैं कि मैं संसार को बार-बार समझाता हूँ कि जो भेड़ की पूँछ पकड़ता है, न उतर सकता है और न पार कर सकता है।
विस्तार
कबीरदास जी यहाँ समझा रहे हैं कि कलयुग का स्वभाव ही लोभी है, जहाँ लोग बस पैसों के जोड़-घटाव और सूद-ब्याज में ही उलझे रहते हैं। वह कहते हैं कि इस संसार सागर से पार उतरने के लिए जो लोग भेड़ की पूँछ पकड़ते हैं, यानी जो तुच्छ और सांसारिक चीज़ों का सहारा लेते हैं, वे कभी पार नहीं उतर सकते। यह तो ऐसा है जैसे कोई नदी पार करने के लिए भेड़ की कमज़ोर पूँछ पर भरोसा करे; इससे भला मंजिल तक कैसे पहुँचा जा सकता है? यह हमें भौतिक मोह-माया त्याग कर सच्ची राह खोजने की प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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