Sukhan AI
ग़ज़ल

कबीर संग्रह 1-10

کبیر مجموعہ 1-10
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के यह दोहे ईश्वर के निरंतर स्मरण पर जोर देते हैं, केवल दुख में ही नहीं बल्कि सुख में भी, ताकि कोई कष्ट न हो। यह केवल बाहरी अनुष्ठानों, जैसे माला जपने, के बजाय आंतरिक भक्ति और मन की शुद्धि की वकालत करते हैं। इन सबके ऊपर, कबीर गुरु की सर्वोच्च भूमिका को उजागर करते हैं, जिन्हें ईश्वर से भी ऊपर माना जाता है, क्योंकि वे शिष्यों को आध्यात्मिक ज्ञान की ओर मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें दिव्य प्राणियों में परिवर्तित करते हैं।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
दुख में सुमरिन सब करे , सुख मे करे न कोय। जो सुख मे सुमरिन करे , दुख काहे को होय॥
दुःख में सभी सुमरन करते हैं, सुख में कोई नहीं। जो सुख में सुमरन करेगा, दुःख क्यों होगा।
2
माला फेरत जुग भया , फिरा न मन का फेर। कर का मन का डार दें , मन का मनका फेर॥
माला फेरने में युग बीत गए, पर मन का झुकाव नहीं बदला। हमें मन के लगाव को त्याग देना चाहिए और मन के मनके बदल देने चाहिए।
3
गुरु गोविन्द दोनों खड़े , काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपनो , गोविंद दियो बताय॥
जब गुरु और गोविंद दोनों सामने खड़े हैं, तो मैं किसके चरणों को स्पर्श करूँ? मैं उस गुरु पर बलिदान करता हूँ, जिन्होंने मुझे गोविंद तक का मार्ग दिखाया।
4
बलिहारी गुरु आपनो , घड़ी-घड़ी सौ सौ बार। मानुष से देवत किया करत न लागी बार॥
गुरु के आप पर बलिहारी है, जो मनुष्य से देवता जैसा व्यवहार करते हैं, वह बार-बार नहीं हो सकता।
5
कबिरा माला मनहि की , और संसारी भीख। माला फेरे हरि मिले , गले रहट के देख॥
कबीरा, तू मन में माला क्यों पिरोता है, या तू सिर्फ एक सांसारिक भिखारी है? भगवान तो माला फेरने से मिलते हैं; गले में कंठी वाले को देख।
6
सुख मे सुमिरन ना किया , दु:ख में किया याद। कह कबीर ता दास की , कौन सुने फरियाद॥
सुख के समय सुमिरन नहीं किया, और दुःख में किया याद। कबीर कहते हैं इस दास से, कौन सुने मेरी फ़रियाद।
7
साईं इतना दीजिये , जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ , साधु ना भूखा जाय॥
हे साईं, मेरे परिवार के लिए इतना प्रदान करें कि न मैं भूखा रहूँ और न ही कोई साधु भूखा जाए।
8
लूट सके तो लूट ले , राम नाम की लूट। पाछे फिरे पछताओगे , प्राण जाहिं जब छूट॥
यदि तुम लूट सकते हो, तो राम नाम की लूट कर लो। बाद में पछताओगे, जब तुम्हारे प्राण छूट जाएंगे।
9
जाति न पूछो साधु की , पूछि लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का , पड़ा रहन दो म्यान॥
साधु की जाति के बारे में नहीं पूछना चाहिए, बल्कि उसके ज्ञान के बारे में पूछना चाहिए। तलवार का मूल्य जानना चाहिए और म्यान को यूँ ही छोड़ देना चाहिए।
10
जहाँ दया तहाँ धर्म है , जहाँ लोभ तहाँ पाप। जहाँ क्रोध तहाँ पाप है , जहाँ क्षमा तहाँ आप॥
जहाँ दया होती है, वहाँ धर्म होता है; जहाँ लोभ होता है, वहाँ पाप होता है। जहाँ क्रोध होता है, वहाँ पाप होता है; और जहाँ क्षमा होती है, वहाँ स्वयं का अस्तित्व होता है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.

कबीर संग्रह 1-10 | Sukhan AI