ग़ज़ल
दान दिए धन ना घटे , नदी ने घटे नीर। अपनी आँखों देख लो , यों क्या कहे कबीर॥
दान दिए धन ना घटे , नदी ने घटे नीर। अपनी आँखों देख लो , यों क्या कहे कबीर॥
कबीर के ये गहरे वचन कालातीत ज्ञान प्रदान करते हैं, दानशीलता को एक ऐसा कार्य बताते हैं जिससे कुछ घटता नहीं, और मानव शरीर की क्षणभंगुर प्रकृति पर विचार करते हैं। वे सभी को शांति प्रदान करने वाली मधुर वाणी की शक्ति पर जोर देते हैं, और मूल्यवान अंतर्दृष्टि साझा करने में विवेक बरतने की सलाह देते हैं।
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1
दान दिए धन ना घटे , नदी ने घटे नीर। अपनी आँखों देख लो , यों क्या कहे कबीर॥
दान देने से धन कम नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे नदी का जल कम नहीं होता। अपनी आँखों से देखो, और बताओ कि ऐसा क्यों कह रहे हो, शायर।
2
दस द्वारे का पिंजरा , तामे पंछी का कौन। रहे को अचरज है , गए अचम्भा कौन॥
दस द्वारे का पिंजरा, उसमें कौन सा पंछी रहता है? यह कैसा अचरज है कि वह अचानक चला गया?
3
ऐसी वाणी बोलेए , मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे , आपहु शीतल होय॥
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि जिससे मन का अहंकार दूर हो जाए। ऐसी वाणी दूसरों को शीतलता प्रदान करती है और स्वयं को भी शांत करती है।
4
हीरा वहाँ न खोलिये , जहाँ कुंजड़ों की हाट। बांधो चुप की पोटरी , लागहु अपनी बाट॥
हीरा वहाँ न खोलना जहाँ कुंजड़ों की हाट में चाहिए। चुपचाप पोटली बांधकर अपनी राह का इंतज़ार करना चाहिए।
5
कुटिल वचन सबसे बुरा , जारि कर तन हार। साधु वचन जल रूप , बरसे अमृत धार॥
टेढ़े-मेढ़े वचन सबसे बुरे होते हैं, ये शरीर को नष्ट कर देते हैं। साधु का वचन पानी के रूप में होता है, जो अमृत की धारा बरसाता है।
6
जग में बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होय। यह आपा तो ड़ाल दे , दया करे सब कोय॥
कवि कहते हैं कि इस संसार में कोई शत्रु नहीं होता, जो मन से शांत और शीतल हो। इस अहंकार को त्याग दो, और सभी लोग दया करेंगे।
7
मैं रोऊँ जब जगत को , मोको रोवे न होय। मोको रोबे सोचना , जो शब्द बोय की होय॥
जब मैं रोऊँ, तो यह कामना है कि संसार मुझे देखकर न रोए। और जो विचार मेरे रोने का कारण बने, वे शब्द कभी न बोले जाएँ।
8
सोवा साधु जगाइए , करे नाम का जाप। यह तीनों सोते भले , साकित सिंह और साँप॥
हे साधु, जागिए और नाम का जाप करें। ये तीनों — मूर्ख, साधु और साँप — वास्तव में सो रहे हैं।
9
अवगुन कहूँ शराब का , आपा अहमक साथ। मानुष से पशुआ करे दाय , गाँठ से खात॥
शायर कहते हैं कि मैं शराब के अवगुणों और अहंकार के साथ-साथ, मनुष्य द्वारा पशु के समान व्यवहार करना और गाँठ से भोजन करना भी बताता हूँ।
10
बाजीगर का बांदरा , ऐसा जीव मन के साथ। नाना नाच दिखाय कर , राखे अपने साथ॥
बाजीगर के बांदरे जैसा यह जीव मन के साथ रहता है, जो अनेक नृत्यों का प्रदर्शन करके स्वयं को हमारे साथ बनाए रखता है।
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