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अवगुन कहूँ शराब का , आपा अहमक साथमानुष से पशुआ करे दाय , गाँठ से खात40

I speak of the faults of wine, and the ego's pride; / Man treats human like beasts, and eats with a knot.

कबीर
अर्थ

शायर कहते हैं कि मैं शराब के अवगुणों और अहंकार के साथ-साथ, मनुष्य द्वारा पशु के समान व्यवहार करना और गाँठ से भोजन करना भी बताता हूँ।

विस्तार

कबीर जी यहां शराब को सिर्फ एक नशा नहीं मानते, बल्कि दुनियावी मोह-माया और अहंकार 'आपा' का प्रतीक बताते हैं। वे समझाते हैं कि जब हम इन चीज़ों में डूब जाते हैं, तो हमारा घमंड हमें इतना अंधा कर देता है कि हम दूसरों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं। अपनी ही बनाई हुई गांठों से हम अपने रिश्तों को उलझाते और खत्म करते जाते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि अपने अंदर के अहंकार और मोह से मुक्त होना कितना ज़रूरी है।

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