ग़ज़ल
कबीर 241-250
کبیر 241-250
कबीर के ये पद एक सच्चे आध्यात्मिक गुरु (सतगुरु) के सर्वोपरि महत्व पर जोर देते हैं। वे दर्शाते हैं कि कैसे एक गुरु की कृपा और शिक्षाएं एक साधारण मनुष्य को एक दिव्य प्राणी में बदल सकती हैं, जिससे गहरी आध्यात्मिक जागृति और दिव्य प्रेम में लीनता आती है। ये पद ईश्वर के नाम के अमूल्य स्वभाव और लालच तथा सच्चे आध्यात्मिक मार्गदर्शन के बिना मार्ग खोजने के खतरों के प्रति भी चेतावनी देते हैं।
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1
क्षमा बड़े न को उचित है , छोटे को उत्पात। कहा विष्णु का घटि गया , जो भुगु मारीलात॥ 241॥
क्षमा बड़े लोगों के लिए उचित है, लेकिन छोटे लोगों के लिए यह उत्पात है। यह कहना कि विष्णु का घड़ा खाली हो गया, कितना मूर्खतापूर्ण दावा है।
2
राम-नाम कै पटं तरै , देबे कौं कुछ नाहिं। क्या ले गुर संतोषिए , हौंस रही मन माहिं॥ 242॥ बलिहारी गुर आपणौ , घौंहाड़ी कै बार। जिनि भानिष तैं देवता , करत न लागी बार॥ 243॥
राम-नाम के सागर को पार करने पर, मैं ईश्वर को कुछ भी दे नहीं सकता। हे संतोषी, मैं अपने मन में क्या रखूँ? मैं उस गुरु पर बलिहारी हूँ, जिन्होंने ईश्वर की बात एक छोटी सी आग के समान की। उन्होंने एक बार भी नहीं कहा।
3
ना गुरु मिल्या न सिष भया , लालच खेल्या डाव। दुन्यू बूड़े धार में , चढ़ि पाथर की नाव॥ 244॥
न गुरु मिले न शिष्य हुआ, लालच से खेला दाँव। दो जहानों की धारा में, पत्थर की नाव चली।
4
सतगुर हम सूं रीझि करि , एक कह्मा कर संग। बरस्या बादल प्रेम का , भींजि गया अब अंग॥ 245॥
सतगुर! आप मुझसे रूठकर, एक बार बात कर लो। प्रेम के बादल बरसा और मेरा तन भीग गया।
5
कबीर सतगुर ना मिल्या , रही अधूरी सीष। स्वाँग जती का पहरि करि , धरि-धरि माँगे भीष॥ 246॥
कबीर कहते हैं कि मुझे सच्चे गुरु की प्राप्ति नहीं हुई, इसलिए मेरी इच्छाएँ अधूरी हैं। मैं भले ही भक्त के वस्त्र धारण करती हूँ, फिर भी बार-बार कोई बड़ा वरदान माँगती हूँ।
6
यह तन विष की बेलरी , गुरु अमृत की खान। सीस दिये जो गुरु मिलै , तो भी सस्ता जान॥ 247॥
यह शरीर विष की बेल की तरह है, लेकिन यह गुरु के अमृत का भंडार भी है। यदि गुरु से मिलने के लिए अपना सिर भी बलिदान करना पड़े, तो भी उसे कम समझना चाहिए।
7
तू तू करता तू भया , मुझ में रही न हूँ। वारी फेरी बलि गई , जित देखौं तित तू॥ 248॥
तू ही तू करता है, और मुझमें अब तू नहीं है। जहाँ भी मेरा वरण होता है, वहाँ मुझे केवल तू ही दिखाई देता है।
8
राम पियारा छांड़ि करि , करै आन का जाप। बेस्या केरा पूतं ज्यूं , कहै कौन सू बाप॥ 249॥
राम और प्रिया को त्याग कर, वह आनंद का जाप करता है। वह तो व्यभिचारिणी के पुत्र के समान है, कि उसका पिता कौन है, यह कोई नहीं बता सकता।
9
कबीरा प्रेम न चषिया , चषि न लिया साव। सूने घर का पांहुणां , ज्यूं आया त्यूं जाव॥ 250॥
कबीरा, प्रेम का अमृत मत पीना और न ही एक घूंट लेना। जिस तरह ये पाँव खाली घर में आए थे, उसी तरह ये जाएँगे।
10
कबीरा राम रिझाइ लै , मुखि अमृत गुण गाइ। फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन , संधे संधि मिलाइ॥ 251॥
कबीर की तरह, जिसने राम की अमृतमयी महिमा का गुणगान किया, उसने टूटे हुए वीणा की तरह मन को जोड़ा और बिखरे हुए मन के हिस्सों को मिला दिया।
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