“Kabir, the true Guru, I could not find; my desires remain incomplete. While I wear the garments of a devotee, I still ask for the terrifying (divine) boon.”
कबीर कहते हैं कि मुझे सच्चे गुरु की प्राप्ति नहीं हुई, इसलिए मेरी इच्छाएँ अधूरी हैं। मैं भले ही भक्त के वस्त्र धारण करती हूँ, फिर भी बार-बार कोई बड़ा वरदान माँगती हूँ।
कबीर दास जी इस दोहे में एक गहरी विडंबना उजागर कर रहे हैं। वे कहते हैं कि लोग साधु-संन्यासियों का वेश तो धारण कर लेते हैं, पर उन्हें सच्चा गुरु नहीं मिला है, जिससे उनकी आध्यात्मिक शिक्षा अधूरी रह गई है। ऐसे में वे बाहर से तो त्यागी दिखते हैं, पर असल में जगह-जगह जाकर अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भीख माँग रहे हैं। यह हमें याद दिलाता है कि बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि सच्ची गुरु कृपा और आत्मज्ञान ही हमें पूर्णता की ओर ले जाता है।
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