राम-नाम कै पटं तरै , देबे कौं कुछ नाहिं। क्या ले गुर संतोषिए , हौंस रही मन माहिं॥ 242॥ बलिहारी गुर आपणौ , घौंहाड़ी कै बार। जिनि भानिष तैं देवता , करत न लागी बार॥

“Crossing the ocean of 'Rama-Nama' (the name of Rama), I have nothing to give to God. What can I take, O content-hearted one, that remains in my mind? O, I sacrifice myself to the Guru, who spoke of God like a little fire. He did not speak even once.”

— कबीर
अर्थ

राम-नाम के सागर को पार करने पर, मैं ईश्वर को कुछ भी दे नहीं सकता। हे संतोषी, मैं अपने मन में क्या रखूँ? मैं उस गुरु पर बलिहारी हूँ, जिन्होंने ईश्वर की बात एक छोटी सी आग के समान की। उन्होंने एक बार भी नहीं कहा।

विस्तार

इन पंक्तियों में कबीर दास जी बताते हैं कि जब हम राम-नाम के सागर को पार कर लेते हैं, यानी जब हम आध्यात्मिक यात्रा में गहरे उतर जाते हैं, तब हमारे पास ईश्वर को चढ़ाने के लिए कोई भौतिक चीज़ नहीं बचती। असली बात तो गुरु की कृपा है! गुरु एक छोटे से संकेत या अपनी शांत उपस्थिति से ही हमें ऐसा ज्ञान दे जाते हैं, जिससे हमारा भीतर जगमगा उठता है और हमें अपनी सच्ची पहचान मिलती है। यही आत्म-बोध, यही जागृति सबसे बड़ी भेंट है।

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