ग़ज़ल

आवत गारी एक है , उलटन होय अनेक। कह कबीर नहिं उलटिये , वही एक की एक॥

आवत गारी एक है , उलटन होय अनेक। कह कबीर नहिं उलटिये , वही एक की एक॥
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के इन दोहों (141-150) में गहरा आध्यात्मिक ज्ञान निहित है। ये नकारात्मकता का जवाब खामोशी से देने की सलाह देते हैं, सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता को रेखांकित करते हैं और सभी के लिए मृत्यु की निश्चितता याद दिलाते हुए, जीवन में आत्म-जागरूकता और अपने वास्तविक उद्देश्य को समझने का आग्रह करते हैं।

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लिपि व अर्थ
1
आवत गारी एक है , उलटन होय अनेक। कह कबीर नहिं उलटिये , वही एक की एक॥
आने वाली गाड़ी एक है, पर उसका लौटना अनेक जैसा हो जाता है। शायर कबीर कहते हैं कि इसे उलटना नहीं चाहिए, क्योंकि एक ही वस्तु एक ही रहती है।
2
आहार करे मनभावता , इंद्री की स्वाद। नाक तलक पूरन भरे , तो कहिए कौन प्रसाद॥
मनभावता (मन को मोहित करने वाली) आहार और इंद्रियों के स्वाद का आनंद लेती है। जब नाक (यानी इंद्रियाँ) स्वाद से पूरी तरह भर जाएं, तो आप बताइए कि वह आनंद क्या है।
3
आए हैं सो जाएँगे , राजा रंक फकीर। एक सिंहासन चढ़ि चले , एक बाँधि जंजीर॥
जो आए हैं वे चले जाएंगे, चाहे वे राजा हों, रंक हों या फकीर। एक सिंहासन पर बैठेगा, और एक जंजीरों से बंध जाएगा।
4
आया था किस काम को , तू सोया चादर तान। सूरत सँभाल ए काफिला , अपना आप पह्चान॥
तू किस काम से आया है, जबकि तू चादर ओढ़कर सोया हुआ है। ऐ काफिले, अपनी सूरत को संभालो और खुद को पहचानो।
5
उज्जवल पहरे कापड़ा , पान-सुपरी खाय। एक हरि के नाम बिन , बाँधा यमपुर जाय॥
चमकीले वस्त्र और पान-सुपारी खाकर वे भोजन करते हैं। हरि (ईश्वर) के नाम के बिना, पूरा गाँव नष्ट हो जाएगा।
6
उतते कोई न आवई , पासू पूछूँ धाय। इतने ही सब जात है , भार लदाय लदाय॥
उतते कोई नहीं आता, मैं पासू से पूछती हूँ धाय। जीवन ऐसा ही है, बोझ उठाते हुए-उठाते हुए।
7
अवगुन कहूँ शराब का , आपा अहमक होय। मानुष से पशुआ भया , दाम गाँठ से खोय॥
शायर कहते हैं कि यह शराब का नशा है; आपका अहंकार बहुत अधिक है। मनुष्य पशु जैसा हो गया है और लालच के बंधन में खो गया है।
8
ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोए। औरन को शीतल करे , आपौ शीतल होय॥
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए, जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को शांति देती है और स्वयं को भी शीतलता प्रदान करती है।
9
कबीरा संगति साधु की , जौ की भूसी खाय। खीर खाँड़ भोजन मिले , ताकर संग न जाय॥
कबीरा कहते हैं कि साधु की संगति जो जौ की भूसी खाने वाले साधु के समान है, वह खीर और खाँड़ जैसे स्वादिष्ट भोजन से भी नहीं मिल सकती।
10
एक ते जान अनन्त , अन्य एक हो आय। एक से परचे भया , एक बाहे समाय॥
एक ही स्रोत से अनंत का ज्ञान होता है, और दूसरा एक इकाई बन जाता है। एक से सृष्टि प्रकट होती है, और दूसरे का निवास भी उसी में होता है।
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आवत गारी एक है , उलटन होय अनेक। कह कबीर नहिं उलटिये , वही एक की एक॥ | Sukhan AI