आहार करे मनभावता , इंद्री की स्वाद। नाक तलक पूरन भरे , तो कहिए कौन प्रसाद॥

“The mind delights in taste, the senses crave flavor's might; when the nose is full to the brim, tell me, what is the delight?”

— कबीर
अर्थ

मनभावता (मन को मोहित करने वाली) आहार और इंद्रियों के स्वाद का आनंद लेती है। जब नाक (यानी इंद्रियाँ) स्वाद से पूरी तरह भर जाएं, तो आप बताइए कि वह आनंद क्या है।

विस्तार

यह दोहा हमें बताता है कि मन को हर स्वादिष्ट चीज़ भाती है और हमारी इंद्रियाँ भी हर स्वाद में खोई रहती हैं। लेकिन कबीर दास जी पूछते हैं कि जब हमारी नाक (जो यहाँ सभी इंद्रियों की चरम तृप्ति का प्रतीक है) पूरी तरह भर जाए, यानी हम बाहरी सुखों में पूरी तरह डूब जाएँ, तो फिर असली आनंद या प्रसाद कहाँ बचता है? यह हमें समझाता है कि हद से ज़्यादा सांसारिक सुखों में लिप्त होने से सच्चा संतोष नहीं मिलता, बल्कि अक्सर एक खालीपन ही रह जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठ
हिंदी अर्थ
अंग्रेज़ी अर्थ
हिंदी विस्तार
अंग्रेज़ी विस्तार
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

← Prev42 / 10