ग़ज़ल

ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है

یہ ہے مے کدہ یہاں رند ہیں یہاں سب کا ساقی امام ہے
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 5 shers· radif: है

यह ग़ज़ल मयकदे के सूफ़ी रूपक के ज़रिए ढोंगी धार्मिकता और संकीर्ण सोच पर चोट करती है। इसमें सच्चे ईश्वरीय प्रेम, उदार हृदय और गहरे आध्यात्मिक सामर्थ्य को दिखावटी तक़वे और पाखंड से कहीं श्रेष्ठ बताया गया है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है ये हरम नहीं है ऐ शैख़ जी यहाँ पारसाई हराम है
यह मयख़ाना है जहाँ शराबी रहते हैं और सबका इमाम साक़ी है; हे शैख़ जी, यह कोई पवित्र हरम नहीं है, यहाँ परहेज़गारी और पाकीज़गी हराम है।
2
जो ज़रा सी पी के बहक गया उसे मय-कदे से निकाल दो यहाँ तंग-नज़र का गुज़र नहीं यहाँ अहल-ए-ज़र्फ़ का काम है
जो थोड़ी सी शराब पीकर ही बहक जाए उसे मयखाने से बाहर निकाल दो, क्योंकि यहाँ संकीर्ण सोच वालों की कोई जगह नहीं है और यह स्थान केवल बड़े दिल और क्षमता वाले लोगों के लिए है।
3
कोई मस्त है कोई तिश्ना-लब तो किसी के हाथ में जाम है मगर इस पे कोई करे भी क्या ये तो मय-कदे का निज़ाम है
कोई नशे में मस्त है, कोई प्यासा है और किसी के हाथ में शराब का जाम है; मगर इस पर कोई क्या कर सकता है, यह तो मयखाने का नियम ही है।
4
ये जनाब-ए-शैख़ का फ़ल्सफ़ा है अजीब सारे जहान से जो वहाँ पियो तो हलाल है जो यहाँ पियो तो हराम है
शेख़ साहब का फ़लसफ़ा पूरी दुनिया से अनोखा है कि अगर वही चीज़ वहाँ (जन्नत में) पियो तो हलाल (जायज़) है, और अगर यहाँ (दुनिया में) पियो तो हराम (नाजायज़) है।
5
इसी काएनात में ऐ 'जिगर' कोई इंक़लाब उठेगा फिर कि बुलंद हो के भी आदमी अभी ख़्वाहिशों का ग़ुलाम है
ऐ जिगर, इसी दुनिया में फिर कोई क्रांति आएगी, क्योंकि इतनी ऊँचाइयों पर पहुँचने के बावजूद इंसान आज भी अपनी इच्छाओं का गुलाम है।
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