ग़ज़ल
तबीअत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
طبیعت ان دنوں بیگانۂ غم ہوتی جاتی ہے
यह ग़ज़ल आंतरिक शून्यता और संवेदनहीनता के उस भाव को व्यक्त करती है जहाँ दिल ग़म से भी बेगाना होने लगता है। शायर ने यहाँ जीवन की उस गहरी उदासी को उभारा है जहाँ खुशियाँ भी अंततः मातम और तड़प का ही कारण प्रतीत होने लगती हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
तबीअत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मिरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है
इन दिनों मेरा दिल ग़म से अनजान होता जा रहा है, और ऐसा लगता है मानो मेरे हिस्से की हर ख़ुशी धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
2
सहर होने को है बेदार शबनम होती जाती है
ख़ुशी मंजुमला-ओ-अस्बाब-ए-मातम होती जाती है
सुबह होने वाली है और ओस जागती जा रही है, जबकि ख़ुशी भी मातम के कारणों में शामिल होती जा रही है।
3
क़यामत क्या ये ऐ हुस्न-ए-दो-आलम होती जाती है
कि महफ़िल तो वही है दिल-कशी कम होती जाती है
ऐ दोनों जहानों के हुस्न, यह कैसी क़यामत आ रही है कि महफ़िल तो वही है लेकिन उसका आकर्षण कम होता जा रहा है।
4
वही मय-ख़ाना-ओ-सहबा वही साग़र वही शीशा
मगर आवाज़-ए-नोशा-नोश मद्धम होती जाती है
मयख़ाना, शराब, प्याला और सुराही सब पहले की तरह ही हैं, मगर शराब पीने-पिलाने का शोर धीरे-धीरे धीमा पड़ता जा रहा है।
5
वही हैं शाहिद-ओ-साक़ी मगर दिल बुझता जाता है
वही है शम्अ' लेकिन रौशनी कम होती जाती है
महबूब और साक़ी वही पुराने हैं मगर फिर भी दिल बुझता जा रहा है, और शम्अ भी वही है लेकिन उसकी रोशनी कम होती जा रही है।
6
वही शोरिश है लेकिन जैसे मौज-ए-तह-नशीं कोई
वही दिल है मगर आवाज़ मद्धम होती जाती है
अंदर वही पुरानी उथल-पुथल है मगर जैसे गहराइयों में दबी कोई लहर हो; दिल भी वही है लेकिन अब उसकी आवाज़ धीमी पड़ती जा रही है।
7
वही है ज़िंदगी लेकिन 'जिगर' ये हाल है अपना
कि जैसे ज़िंदगी से ज़िंदगी कम होती जाती है
ज़िंदगी तो वही है लेकिन ऐ 'जिगर' मेरा हाल ऐसा है कि लगता है जैसे ज़िंदगी में से ही ज़िंदगी कम होती जा रही है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
