सहर होने को है बेदार शबनम होती जाती है — जिगर मुरादाबादी
“Dawn draws near, and awakening stirs within the dew; Joy itself turns into a cause for mourning, too.”
अर्थ
सुबह होने वाली है और ओस जागती जा रही है, जबकि ख़ुशी भी मातम के कारणों में शामिल होती जा रही है।
विस्तार
यहाँ सुबह होने का मंज़र एक अनोखी उदासी समेटे हुए है। भोर की पहली किरण आमतौर पर नई उम्मीद और ख़ुशी लाती है, लेकिन शायर को ओस की बूंदों का जागना आंसुओं की तरह दिखाई देता है, क्योंकि सूरज निकलते ही उनका वजूद ख़त्म हो जाएगा। इस शेर में यह गहरा सच छिपा है कि कभी-कभी जिसे दुनिया जश्न या शुरुआत समझती है, वही किसी के लिए बिछड़ने और मातम का सबब बन जाता है।
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