उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ — जिगर मुरादाबादी
उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ
जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं
“Ask not of the vengeance exacted by the night / From one who spent the daytime laughing bright.”
— जिगर मुरादाबादी
अर्थ
उस व्यक्ति की रातों के इंतिक़ाम या दर्द के बारे में मत पूछो, जिसने अपने दिन हँस-हँसकर गुज़ारे हैं।
विस्तार
यह शेर उस गहरे दर्द को बयां करता है जिसे लोग अक्सर अपनी मुस्कान के पीछे छुपा लेते हैं। दिन के उजाले में तो इंसान महफ़िल और दुनियादारी के लिए हँस-बोल लेता है, लेकिन तन्हा रातें उस बनावटी हँसी का सारा हिसाब चुकता करती हैं। रात का यह 'इंतिक़ाम' दरअसल वह ख़ामोश आँसू और तन्हाई है, जो इंसान को अंदर तक तोड़ कर रख देती है।
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