ग़ज़ल
इश्क़ को बे-नक़ाब होना था
عشق کو بے نقاب ہونا تھا
यह ग़ज़ल प्रेम के प्रकटीकरण और उसके उन्मुक्त, अलौकिक स्वरूप को दर्शाती है। इसमें इश्क़ की गहन बेचैनी, मदहोशी और आत्म-समर्पण के भाव को अत्यंत सुंदरता से व्यक्त किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
इश्क़ को बे-नक़ाब होना था
आप अपना जवाब होना था
2
मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था
बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था
3
तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
हाँ मुझी को ख़राब होना था
4
आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले
हो चुका जो इताब होना था
5
कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया
जिस को ख़ाना-ख़राब होना था
6
मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते
ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब होना था
7
दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगा-रंग
उस को सादा किताब होना था
8
हम ने नाकामियों को ढूँड लिया
आख़िरश कामयाब होना था
9
हाए वो लम्हा-ए-सुकूँ कि जिसे
महशर-ए-इज़्तिराब होना था
10
निगह-ए-यार ख़ुद तड़प उठती
शर्त-ए-अव्वल ख़राब होना था
11
क्यूँ न होता सितम भी बे-पायाँ
करम-ए-बे-हिसाब होना था
12
क्यूँ नज़र हैरतों में डूब गई
मौज-ए-सद-इज़्तिराब होना था
13
हो चुका रोज़-ए-अव्वलीं ही 'जिगर'
जिस को जितना ख़राब होना था
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