ग़ज़ल

इश्क़ को बे-नक़ाब होना था

عشق کو بے نقاب ہونا تھا
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 13 shers· radif: होना था

यह ग़ज़ल प्रेम के प्रकटीकरण और उसके उन्मुक्त, अलौकिक स्वरूप को दर्शाती है। इसमें इश्क़ की गहन बेचैनी, मदहोशी और आत्म-समर्पण के भाव को अत्यंत सुंदरता से व्यक्त किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
इश्क़ को बे-नक़ाब होना था आप अपना जवाब होना था
2
मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था
3
तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं हाँ मुझी को ख़राब होना था
4
आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले हो चुका जो इताब होना था
5
कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया जिस को ख़ाना-ख़राब होना था
6
मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब होना था
7
दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगा-रंग उस को सादा किताब होना था
8
हम ने नाकामियों को ढूँड लिया आख़िरश कामयाब होना था
9
हाए वो लम्हा-ए-सुकूँ कि जिसे महशर-ए-इज़्तिराब होना था
10
निगह-ए-यार ख़ुद तड़प उठती शर्त-ए-अव्वल ख़राब होना था
11
क्यूँ न होता सितम भी बे-पायाँ करम-ए-बे-हिसाब होना था
12
क्यूँ नज़र हैरतों में डूब गई मौज-ए-सद-इज़्तिराब होना था
13
हो चुका रोज़-ए-अव्वलीं ही 'जिगर' जिस को जितना ख़राब होना था
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