“Alas, that fleeting moment of calm, destined to become an apocalypse of restless agony.”
अफ़सोस सुकून के उस पल पर, जिसे आगे चलकर बेचैनी और तड़प का तूफ़ान बनना था।
शायर यहाँ ज़िंदगी की एक गहरी और दर्दभरी विडंबना को सामने लाते हैं, जहाँ सुकून का एक छोटा-सा पल आगे चलकर बेपनाह बेचैनी का सबब बन गया। 'हाए' की एक टीस भरी आह के साथ वे याद करते हैं कि जिस लम्हे ने उन्हें चैन दिया था, वही दरअसल क़यामत जैसी तड़प यानी महशर-ए-इज़्तिराब की शुरुआत साबित हुआ। यह शेर हमें समझाता है कि कभी-कभी ज़िंदगी में मिलने वाली ज़रा-सी राहत बाद में आने वाले तूफ़ान को और भी ज़्यादा तकलीफ़देह बना देती है।
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